Home Featured अपनी पूछ बढाने और खर्चा करवाने केलिए दलों के आका बिना वैकेंसी के भी नये उम्मीदवारों को बेच रहे टिकट की उम्मीद!

अपनी पूछ बढाने और खर्चा करवाने केलिए दलों के आका बिना वैकेंसी के भी नये उम्मीदवारों को बेच रहे टिकट की उम्मीद!

दरभंगा। अभिषेक कुमार

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ज्यों ज्यों नजदीक आता जा रहा है, सभी दलों में उम्मीदवारों की उम्मीदें हिलोरे मारने लगी है। टिकट की उम्मीद में सभी संभावित चेहरे क्षेत्र में नजर आने के साथ साथ अपने आकाओं की तेल मालिश में लग चुके हैं। ऐसे माहौल में पार्टी के वरीय नेता भी किसी को नाराज नहीं कर रहे, एक विधानसभा में दस दस उम्मीदवारों की पीठ अकेले में ठोक रहे और उन्हें पटना से दिल्ली तक यकीन दिलाया जा रहा है कि उन्ही का टिकट इसबार लगभग कंफर्म है। बस थोड़ी और मेहनत की जरूरत है। वरीय नेताओं के मुंह से ऐसे वचन सुनकर बेचारे निरीह कार्यकर्ता गदगद हो जाते हैं और जड़ जमीन बेचकर भी पार्टी केलिए सर्वस्व लगा रहे हैं। साथ ही आकाओं के स्वागत में और तोहफ़ों में सबकुछ निछावर करते जा रहे हैं।

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यह हाल किसी एक दल या गठबंधन का नहीं है, बल्कि कमोबेश सभी जगह यही दृश्य देखने को मिल रहा है। कुछ पुराने और कद्दावर नेता, जिनका वर्षो से पार्टी में रहकर भी उद्धार नहीं हुआ, वे भी जबरन अंतिम सांस तक आस बनाकर जोश को कम नहीं होने दे रहे। कुछ नए नवेले चेहरे जिनके सोशल मीडिया में 500 से 1000 फॉलोवर्स हैं, उन्हें भी लगता है कि वे काफी चर्चित नेता बन गए हैं और सभी पार्टी युवाओं की बात कर रही है। ऐसे में पार्टी की नजर उनपर है। यदि कोई नेता दिल्ली पटना से आते हैं तो ऐसे युवा और प्रौढ़ नेता अपनी उपलब्धियों की गाथा उन्हें अकेले में मिलकर सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दिल्ली पटना वाले वरीय नेता भी उन्हें निराश बिल्कुल नहीं करते। वे भी ऐसे स्वयंभू नेताओ को प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर तक उनकी चर्चा चलने और इसबार टिकट मिलने की पूरी उम्मीद की बात कहकर उनका जोश कई गुना बढ़ा देते हैं।

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वरीय नेताओं के मुंह से ऐसी बातें सुनकर ऐसे उम्मीदवारों की फौज जमीन जत्था बेचकर भी अपने लिए गाड़ी और दो चार चेलों का जुगाड़ करने में लग जाते हैं। जहां जाएं, चार चक्का से जाएं और चेलों को लेकर जाएं और उनसे जयजयकार करवाएं और सोशल मीडिया पर तारीफें गढ़वाएँ। पर ऐसे चेले भी कम तेज नहीं होते। वे भी मौके का खूब फायदा उठाते हैं। अपने नेताजी की चाकरी के बदले चाय नाश्ता और खर्चा पानी लेने लगते हैं। नेताजी को जब चेले ज्यादा बोझ लगने लगते हैं तो वरीय नेताओं की तरह ऐसे नेता भी अपने चेलों को भविष्य की उम्मीद बेचकर खटवाने में लग जाते हैं। इसप्रकार हर चुनाव की तरह इसबार भी सभी इस मेले का लुफ्त उठाने में लग गए हैं।

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