Home Featured मठ-मंदिरों में फिर गूंजेगी संस्कृत की वाणी, प्रदेशभर में पढ़ाई शुरू कराने की योजना: मृत्युंजय झा।
Featured - मुख्य - August 6, 2025

मठ-मंदिरों में फिर गूंजेगी संस्कृत की वाणी, प्रदेशभर में पढ़ाई शुरू कराने की योजना: मृत्युंजय झा।

दरभंगा: “संस्कृत है तो संस्कृति है, संस्कार है और तभी राष्ट्र भी है।” इसी भावना को केंद्र में रखते हुए बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने बुधवार को कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के दरबार हॉल में आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोह के उद्घाटन सत्र में यह विचार व्यक्त किए।

Advertisement

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अध्यक्ष श्री झा ने कहा कि संस्कृत के उत्थान व विकास के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास जारी हैं। उन्होंने बताया कि राज्यभर के पंजीकृत करीब 400–450 मठों और मंदिरों में संस्कृत की पढ़ाई शुरू करने की योजना पर तेजी से काम हो रहा है। इन स्थलों पर गुरुकुल परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए बोर्ड के पाठ्यक्रमों को संचालित किया जाएगा।

Advertisement

उन्होंने बताया कि आगामी 12 अगस्त को पटना के रविंद्र भवन में बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड का पोर्टल लॉन्च किया जाएगा। इस अवसर पर प्रदेशभर से 648 प्रधानाचार्यों को आमंत्रित किया गया है। साथ ही 45 विद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जाएगा। श्री झा ने कहा कि एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के इस युग में सभी गतिविधियों को डिजिटल पोर्टल पर अपलोड करना समय की मांग है।

Advertisement

अपने संबोधन में उन्होंने तीन अंग्रेजी शब्द – पॉजिटिव, नैरेटिव और मैसिव – पर बल देते हुए कहा कि यदि सकारात्मक सोच के साथ कार्य किया जाए तो संस्कृत की स्थिति में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब सभी स्कूलों में संस्कृत भाषा में ही प्रार्थना अनिवार्य कर दी गई है। उन्होंने बोर्ड और विश्वविद्यालय के बीच समन्वय की आवश्यकता पर भी बल दिया।

Advertisement

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पांडेय ने कहा कि राष्ट्र की ज्ञान परंपरा संस्कृत में ही समाहित है और इसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह भाषा कभी व्यवहारिक जीवन का हिस्सा थी, लेकिन बीच के कालखंड में उपेक्षा के कारण यह केवल सभा-चर्चाओं तक सीमित रह गई। अब संस्कृतज्ञों पर इसका पुनः प्रसार और जन-संपर्क का दायित्व है।

विशिष्ट अतिथि व पूर्व कुलपति प्रो. देवनारायण झा ने कहा कि “संस्कृत केवल भाषा नहीं, विद्या है। विद्या संरक्षित होगी तो शास्त्र और राष्ट्र भी सुरक्षित रहेंगे।” उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे समर्पण के साथ अध्ययन करें जिससे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़े।

सारस्वत अतिथि एवं पुराण संकायाध्यक्ष प्रो. दिलीप कुमार झा ने संस्कृत की वैज्ञानिकता और वर्तमान उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संस्कृत न केवल प्राचीन भाषा है, बल्कि आज भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है।

इस अवसर पर डीन डॉ. शिवलोचन झा ने अतिथियों का स्वागत किया, कुलानुशासक प्रो. पुरेन्द्र वरिक ने धन्यवाद ज्ञापन किया तथा मंच संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. रामसेवक झा ने किया।

Share