Home Featured मिथिला की संस्कृति जल-जैविक आधारित: प्रो. विद्यानाथ झा।
Featured - मुख्य - February 16, 2025

मिथिला की संस्कृति जल-जैविक आधारित: प्रो. विद्यानाथ झा।

दरभंगा: रविवार को रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय, दरभंगा के सभागार में पोथीघर फाउण्डेशन और म. अ. रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में पोथीघर फाउण्डेशन द्वारा आरंभ किए गए द्वादश व्याख्यानमाला का ‘मिथिलामे जल-जैविक सम्पादक समुचित उपयोग’ विषयक चतुर्थ व्याख्यान प्रो. विद्यानाथ झा, वनस्पति विशेषज्ञ सह से.नि. प्रधानाचार्य, एम.एल.एस.एम. महाविद्यालय, दरभंगा द्वारा दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ दिनेश झा, प्रधानाचार्य, म. अ. रमेश्वरलता संस्कृत महाविद्यालय ने की।

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मैथिल परंपरा अनुसार वरीय इतिहासकार डॉ अवनींद्र कुमार झा के द्वारा वक्ता  को और साहित्यकार  हिरेंद्र झा द्वारा अध्यक्ष महोदय को सम्मानित किया गया।

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व्याख्यान को संबोधित करते हुए प्रो. झा ने मिथिला के जलीय जैविक एवं वानस्पतिक विविधताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि- “मिथिला की संस्कृति जल-जैविक आधारित है। इसीलिए, उचित जल प्रबंधन के बिना यहां विकासोन्मुख होना संभव नहीं है। कश्मीर से मणिपुर तक के लोगों के बीच मखान एक खाद्य के रूप में मौजूद है, जिसमें मिथिला परिक्षेत्र सहित कुछ भाग बंगाल को छोड़कर कहीं भी इसकी खेती नहीं की जाती; ये जलस्रोतों में स्वतः ही उगते हैं। मखान खाद्य पदार्थ के साथ-साथ औषधि भी है। यह फ़ैटलेस एवं एंटीऑक्सीडेंट होने के साथ ही पोषण से भरपूर एक सुपरफूड है। इसमें पाए जाने वाले प्रमुख पोषक तत्वों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, खनिज तत्व, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, सोडियम, लौह, जिंक, विटामिन बी1, बी2, बी3, ए, सी, अमीनो एसिड, लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स आदि हैं। इस प्रकार मखान एक संपूर्ण पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ है, जो हड्डियों, हृदय, पाचन तंत्र और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए फायदेमंद है। इसे नियमित आहार में शामिल करने से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। मखान की खेती चूना रहित क्षेत्रों में अधिक होती है।” इसके अलावे मिथिला के जलीय उत्पादों में सिंघारा, कमल, भैंठ, खोभी, करमी, सिक्की घास, कोइर्हला, जल कुंभी, ढैंचा, थेथर, खुरचन, डोका, घोंघा आदि के बारे में भी विस्तार पूर्वक जानकारी दिए।

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प्रश्नोत्तरी में प्रकाश कुमार, रंजीत कुमार, सुमित श्री, आशुतोष मिश्र ने वक्ता महोदय से अपने प्रश्नों का समुचित उत्तर प्राप्त किया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ दिनेश झा ने कहा कि- “पूर्व काल में बाढ़ का आना स्वाभाविक था, जो आज के अपेक्षा अधिक था। किंतु, बाढ़ का पानी ढाई दिनों से अधिक नहीं रुकती थी। आज की स्थिति यह है, की बारिश के पानी से भी बाढ़ सी स्थिति हो जाती है। कारण स्पष्ट है! तेज गति से तालाब भरे जा रहे हैं। मिथिला में जल से संबंधित उद्योगों का भी प्रबंधन बेहतरीन था, तालाब से मछली, मखान, खुरचन आदि के साथ इसके किनारे पान की खेती भी होती थी। यहां कइयों उद्योग थे, जिससे तत्कालीन मिथिला के लोग हर तरह से संपन्न थे। लेकिन, आज वर्तमान समय में हाल बेहाल है। शहर के भीतर बने सभी नहरों का वर्तमान स्वरूप पक्का नाला हो गया है। पूर्व काल में इन नहरों में लोग नहाया करते थे। जहां, आज उसी नालों के किनारे खड़े रहना भी मुश्किल है। मिथिला में जहां तालाब का निर्माण किया जाना समाजोपयोगी उत्कृष्ट कार्य मानी जाती थी, वह आज कहीं नहीं दिखता। मिथिला में जलों की बहुलता रही है, इसीलिए; अभी भी जल आधारित विविध उद्योग लगाई जा सकती है। इस पर यहां के समाज को सजग होने की आवश्यकता है। मिथिला के विविधताओं में जल के साथ जलीय जैविक एवं वानस्पतिक संपदाओं का महत्वपूर्ण स्थान है, जिससे संबंधित विस्तृत जानकारी आज प्रस्तुत की गई है। इस तरह के बहुपयोगी और समाजोपयोगी विषयों से संबंधित व्याख्यान नियमित रूप से होती रहनी चाहिए, जिसके लिए पोथीघर फाउण्डेशन के द्वारा उठाया गया यह कदम अनुकरणीय है।”

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पोथीघर फाउण्डेशन का नारा “लाउ व्यवहार मे, पोथी उपहार मे” के तहत पोथीघर फाउण्डेशन की अध्यक्षा  गुड़िया झा के द्वारा वक्ता और डॉ राम सेवक झा के द्वारा अध्यक्ष  को पोथी उपहार स्वरूप प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन  आशुतोष मिश्र ने और धन्यवाद ज्ञापन पोथीघर फाउण्डेशन के सचिव  आनंद मोहन झा ने किया।

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इस मौक़े पर डॉ अवनींद्र कुमार झा, वैद्य गणपति नाथ झा,  हिरेंद्र झा, नारायण जी चौधरी,  कृष्ण कुमार, श्री मोदनाथ मिश्र, शाश्वत मिश्र, गुड़िया झा, मुरारी कुमार झा, सहित कई प्रोफ़ेसर, शोधार्थी, भाषा प्रेमी एवं छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

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