
दरभंगा में जीवन की जगह मौत बाँट रहा है पारस हॉस्पिटल। Voice of Darbhanga

दरभंगा। अभिषेक कुमार
“मशहूर है फिर है भी है बदनाम वो” चमेली फिल्म के गाने के ये बोल पारस अस्पताल पर बिलकुल सटीक बैठते हैं। अस्पताल वह जगह है जहां मरीज अपने रोग का इलाज कराने जाते हैं लेकिन दरभंगा के आलिशान पारस अस्पताल की कहानी उलटी है। यहाँ मरीजों को मौत बांटी जाती है। लाखों लुटाने के बाद इलाज के एवज में मौत लेकर वापस आते परिजनों के आंसू चीख-चीख कर दरभंगा में आलिशान भवन और सुविधा के नाम पर गरीबों को लूटने वाले इस संस्थान की सच्चाई बयान करते हैं। अभी इस अस्पताल को खुले हुए एक साल भी नहीं हुआ है लेकिन इलाज के नाम पर मरीजों को लूटने में पारस ने अन्य निजी अस्पतालों को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
कहानी शुरू होती है अगस्त 2016 से जब पटना में इसी अस्पताल के एक दूसरे ब्रांच में एक मरीज के परिजनों ने मरीज की मौत पर हंगामा किया था। बताया गया कि मरीज के साथ आये परिजनों को मरीज से मिलने नहीं दिया गया और उनको बताया गया कि मरीज आईसीयू में भर्ती है। अपने प्रिय की जान बचाने को परिजनों ने पानी की तरह पैसा बहाया लेकिन जब उन्हें ये पता चला कि मरीज की मौत के बाद भी सिर्फ अस्पताल के बिल का मीटर बढाने के लिए उसको आईसीयू में रखा गया तो उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया। इस घटना का विडियो सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक में वायरल हुआ। अस्पताल प्रशासन ने सफाई दी। पैसे और रसूख के बल पर मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
इस घटना के एक हफ्ते बाद ही 20 अगस्त को दरभंगा में ऐसा ही एक वाकया हुआ और मरीज की मौत के बाद परिजनों ने पारस अस्पताल प्रशासन पर अनियमितता बरतने का आरोप लगाया। मीडिया प्रतिनिधियों ने 20 अगस्त की इस घटना को प्रमुखता से प्रकाशित किया और घटना को लेकर अस्पताल की कर्मचारी देबोलिना भट्टाचार्य से फोन पर जानकारी लेने का प्रयास किया तो बताया गया कि मरीज के साथ आये परिजनों ने शराब के नशे में हंगामा किया। यह साफ़ झूठ था। क्यूंकि अगर शराब के नशे में परिजनों ने हंगामा किया तो फिर पुलिस ने इस बात की पुष्टि क्यूँ नहीं की?
इलाज में अनियमितता बरतने का यह पहला मामला था। 20 अगस्त के बाद से आये दिन सोशल मीडिया में पारस दरभंगा की लूट की खबरें शेयर होती रहीं। लेकिन प्रशासन और मीडिया ने अपनी आँखें बंद रखीं। गरीबों को लूटने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। मार्गदर्शन संस्थान के संचालक रोहित सिंह से जब हमने पारस अस्पताल के बारे में जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया कि नोटबंदी के दौरान उनके पिताजी को दिल का दौरा आया था। अपने पिता की जान बचाने के लिए जब वो पारस अस्पताल गए तो बिना पैसे के उनको एडमिट करने से मना कर दिया गया। इतना ही नहीं करीब डेढ़ लाख रूपये खर्च करने के बाद भी उनका सही इलाज नहीं हुआ और उन्हें इलाज के लिए दूसरे अस्पताल जाना पड़ा।
गरीबों को लूटने का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 29 जनवरी को दरभंगा के डरहार ग्राम निवासी अमित झा की भतीजी को इलाज के लिए पारस अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनकी मौत हो गयी। भतीजी की मौत से आहत अमित ने तत्काल प्रशासन से पारस के विरुद्ध कार्रवाई करने का आग्रह किया लेकिन दरभंगा प्रशासन पारस के रसूख के सामने बौना नजर आया और अस्पताल प्रशासन पर कोई कार्रवाई नहीं किया गया।
वहीं 25 जनवरी हो हुए स्कूल बस दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल चालक ब्रजभूषण तिवारी की तीन फरवरी की शाम मौत हो गई। जब इस बाबत परिजनों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि चालक को गंभीर हालत में ही अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया इस वजह से उनकी मौत हो गई। परिजनों ने बताया कि श्री तिवारी को कभी होश आता था और फिर बेहोश हो जाते थे। ऐसे में परिजनों ने डिस्चार्ज करने से मना किया तो उन्हें अस्पताल प्रबंधन द्वारा बताया गया कि स्कूल प्रबंधन के दवाब में श्री तिवारी को डिस्चार्ज किया जा रहा है। इस प्रकार श्री तिवारी को जबरन डिस्चार्ज किया गया और और तीन फरवरी की शाम उनकी मौत हो गयी।
वहीं घटना के बारे में स्कूल संचालक डा0 बी के मिश्रा ने कहा कि अस्पताल का आरोप बिलकुल निराधार है। उन्हें डिस्चार्ज की जानकारी भी नहीं है। अभी तक पारस ने उन्हें बिल भी नही भेजा है। उन्हें यही पता है कि अभी तक श्री तिवारी का इलाज़ चल रहा है। यदि अस्पताल प्रबंधन से नही संभल रहा था तो उन्हें रेफर करना चाहिये था न कि डिस्चार्ज। यह पूरी तरह से अस्पताल की लापरवाही है।
इसके बाद जब परिजनों ने हंगामा किया तो अस्पताल प्रबंधन द्वारा मृतक का पोस्टमार्टम न होने का दवाब देने की बात सामने आयी। इस आरोप में दम भी है क्योंकि तीन फरवरी की शाम तबियत बिगड़ने पर अस्पताल आये उक्त ड्राइवर की जब मौत हो गयी तो अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को सूचित क्यों नही किया जबकि यह पुलिस केस था और अस्पताल प्रबंधन को अच्छी तरह पता था। क्यों परिजनों को शव के साथ घर भेज दिया गया?इन सब के वावजूद जब पोस्टमार्टम न करने के दवाब की बात पता चली तो स्थानीय मीडिया कर्मी अभिषेक कुमार ने 5 फरवरी को मृतक के घर से लेकर पोस्टमार्टम घर तक तत्परता दिखायी और तमाम दवाब के वाबजूद शव का पोस्टमार्टम हुआ।
आपको बता दें की अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से अबतक एक दर्जन से ज्यादा मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि बिहार का स्वास्थ्य विभाग क्या कर रहा है और दरभंगा का प्रशासन मौन क्यूँ है? क्या गरीब होना गुनाह है? कबतक मरीजों को इलाज के नाम पर लूटने का गोरख-धंधा पारस अस्पताल के द्वारा जारी रहेगा। मीडिया में पारस अस्पताल के बड़े-बड़े विज्ञापन देखकर इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि प्रिंट मीडिया ने अपनी आँखें क्यूँ बंद कर रखी हैं। क्या इसी तरह मरीजों की हत्या होती रहेगी या प्रशासन चेतेगा?

