
दरभंगा के पारस अस्पताल द्वारा फिर एक युवक की जान से खेलने का मामला आया सामने। Voice of Darbhanga

अभिषेक कुमार एवं राजीव झा की संयुक्त कवरेज
दरभंगा: शहर में ग़रीबो का खून चूस कर मरीजो के जान से खेलने का रिकॉर्ड लगता है पारस हॉस्पिटल द्वारा बनाने का टारगेट निर्धारित कर लिया गया है। चार फरवरी के सुबह में घनश्यामपुर प्रखण्ड के रासियारी निवासी मुरारी मोहन झा ने अपने 17 वर्षीय पुत्र विष्णु कुमार की हालत बिगड़ने पर पारस हॉस्पिटल इस उम्मीद से लाये कि उनके पुत्र की जिंदगी बच जाए। खेती गृहस्थी कर भरण पोषण करने वाले श्री झा ने अपनी पूरी जमा पूंजी बेटे के इलाज़ में लगा दी। परंतु अब उन्हें रेफर कराकर पटना जाना पड़ रहा है।
पुरे मामले पर श्री झा ने वॉइस ऑफ़ दरभंगा को बताया कि 3 फरवरी की शाम में उनका बेटा क्रिकेट खेल कर आया और पेट खराब तथा उसके बाद उल्टी बुखार से पीड़ित हो गया। एक दिन स्थानीय स्तर पर इलाज़ के बाद भी जब बुखार 103 पर पहुँचा रहा तो 4 फरवरी की रात दरभंगा आ गए और 5 फरवरी सुबह 6 बजे अपने पुत्र को पारस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। वहां उन्हें ब्लड का प्लेट रेट कम होने और 4 यूनिट ब्लड की आवश्यकता बतायी गयी। परंतु दो दिन में 8 यूनिट ब्लड चढ़ा चुकने के बाद भी थोड़ा सुधार नही हुआ। पूछने पर 10 यूनिट और ब्लड की व्यवस्था करने का नाम बोल दिया गया। परंतु उनके ग्रामीण चिकित्सा जो जगत से जुड़े थे वे पहुँच कर जब बीमारी की जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की तो उन्हें पहले घुमाया फिराया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि 8 यूनिट के बाद प्लेट रेट में यदि सुधार जरा भी नही आ रहा तो कुछ तो समस्या है या बीमारी पकड़ में नही आ रही। तब काफी कोशिश के बाद सिट्रीसिमिया नामक किसी बीमारी की बात बताई गयी और पटना रेफर किया गया। अब सबकुछ लूटा कर अंतिम हालत में अपने बेटे को रात के करीब पौने नौ बजे पटना लेकर निकलने की तैयारी कर रहे एक पिता के आँखों में बेबसी के आँसू के अलावा और कुछ नजर नही आ रहा था।
अब सवाल यह है कि लगातार अनियमितताओं की शिकायतों और जान पर खेलने के वाबजूद भी इस अस्पताल प्रबंधन के विरुद्ध प्रशासन और प्रतिनिधियों की चुप्पी कब टूटेगी? क्या तब तक इस अस्पताल में यूँ ही मौत का व्यापार होता रहेगा?

