
पेट्रोल काण्ड: केस में गवाहों की कमी से कहीं बेकार न हो जाये जनआंदोलन! Voice of Darbhanga

दरभंगा। अभिषेक कुमार
गत 25 मार्च को भूमि विवाद में गुप्ता स्वीट्स के मालिक कैलाश गुप्ता एवं उसके पुत्रों द्वारा लहेरियासराय स्वीट होम चौराहा के पास दिन दहाड़े कबिलपुर ग्राम निवासी मनोज चौधरी को ज़िंदा जलाने और गुरूवार की शाम दिल्ली में इलाज़ के दौरान मौत हो जाने के बाद शुक्रवार को हुए जबरदस्त जन आंदोलन का दवाब प्रशासन पर दिखा और लहेरियासराय थानाध्यक्ष डीएन मण्डल को तत्काल प्रभार से हटाया गया और एसआईटी गठित कर मामले के स्पीडी ट्रायल की मांग भी मान ली गयी। इसे आंदोलन की एक बड़ी जीत निश्चित रूप से कहा जाएगा।
इस चर्चित मामले की जड़ और असलियत जानने की कोशिश वॉइस ऑफ़ दरभंगा ने की है जिससे तस्वीर के सभी पहलु सामने आ सके। इस दुर्दांत घटना को पुलिस प्रशासन की नाकामी जरूर कहा जाएगा। पर सबसे बड़ी बात कि घटना के दर्जनों प्रत्यक्षदर्शियों में से केवल दो गवाह बड़ी मुश्किल से पुलिस को मिल पाये हैं। किसी भी अधिकारी या पदाधिकारी के निलंबन के वाबजूद जब तक ज्यादा से ज्यादा संख्या में गवाह सामने नही आयेंगे, केस कमजोर होगा और आरोपियों को इसका लाभ मिल सकता है। सभी आरोपियों की त्वारित गिरफ्तारी का भी फायदा नही हो पायेगा।
थानाध्यक्ष एवं अन्य पुलिस पदाधिकारी के संलिप्तता के आरोप पर बात की जाय तो वॉइस ऑफ़ दरभंगा के हाथ लगे कुछ सबूत एक और कहानी भी प्रस्तुत करते हैं। घटना से कुछ दिन पूर्व अदालत में विचाराधीन और 144 लगे होने के वाबजूद कैलाश गुप्ता द्वारा दीवार बना लेने के खिलाफ मनोज चौधरी ने लहेरियासराय थाना को आवेदन दिया था। आवेदन के बाद थानाध्यक्ष ने आरोपियों को बुलाकर मनोज चौधरी के सामने फटकारते हुए दीवार तोड़कर यथा स्थिति बनाने का निर्देश दिया। यदि गुप्ता परिवार के द्वारा दीवार नही हटाया गया तो एक और केस करके जेल भेजने की चेतावनी भी दी गयी थी। परंतु गुप्ता परिवार द्वारा दीवार नही हटाया गया। यह तथ्य प्रवीण गुप्ता द्वारा आईजी को दिए एक आवेदन के आधार पर सामने आ रहा है। 23 मार्च को यानि घटना से दो दिन पूर्व कैलाश गुप्ता के पुत्र प्रवीण गुप्ता द्वारा आईजी को थानाध्यक्ष द्वारा धमकाने एवं बने हुए दीवार को मनोज चौधरी के पक्ष में तुड़वाने की धमकी देने नही केस में फंसा कर जेल भेजने की धमकी का आवेदन थानाध्यक्ष के विरोध में दिया गया था।
24 मार्च यानि घटना से एक दिन पूर्व सुबह 5 बजे विभाग के निर्देश पर एक महत्वपूर्ण केस की छानबीन केलिए थानाध्यक्ष डीएन मण्डल पटना गये थे। 25 मार्च को घटना के दिन भी वह पटना में ही थे। पर जैसे ही उन्हें घटना की सूचना मिली वे तुरन्त लौट आये सबकुछ छोड़ कर और 25 मार्च की शाम थाना पहुंचे। परंतु तबतक तत्कालीन इंचार्ज कुंदन सिंह के नेतृत्व में सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चूका था। आरोपियों को जेल भेजने केलिए केस केलिए गवाह की जरूरत होने पर बड़ी मुश्किल से पुलिस को दो गवाह मिल पाये। संभव है कि थानाध्यक्ष की संलिप्तता प्रीप्लान हो, मगर यदि उन्हें घटना से एक दिन पूर्व विभागीय कार्य से पटना जाना पड़ा हो प्लान के तहत, तो निश्चित रूप से ये सिर्फ थानाध्यक्ष का प्लान नही हो सकता।
अब घटना के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलने के साथ साथ इस दुस्साहस का बल प्रदान करने वाले संरक्षकों का सामने आना भी अत्यंत आवश्यक है। निश्चित तौर पर थानाक्षेत्र में ऐसी वीभत्स घटना होने पर थानाध्यक्ष की जिम्मेवारी तो बनती है और उनपर कारवाई भी हुई है। पर क्या दरभंगा शहर में भूमाफियाओं के बढ़ते मनोबल केलिए सिर्फ एक थानाध्यक्ष ही जिम्मेवार हो सकता है? अगर नही तो फिर क्या यह संभव नही है कि प्रायोजित तौर पर भूमाफिया के राजनितिक एवं बड़े प्रशासनिक संरक्षकों को बचाने और मुकदमे के कमजोर कड़ी को छिपा कर आरोपियों को लाभ पहुंचाने का राजनितिक षड्यंत्र हो कि थानाध्यक्ष को ही सिर्फ टारगेट कर दिया जाय और थानाध्यक्ष पर कारवाई के बाद लोगो का आक्रोश शांत हो जाय। ये सभी जानते हैं कि लोग तत्काल आक्रोशित होते हैं। थानाध्यक्ष पर करवाई होते ही लोग आंदोलन खत्म करके बहुत जल्द घटना को भूल जाते हैं। केस का क्या हुआ, ये खोज न जनता, न नेता और न मीडिया करती है।
सवाल तो बहुत सारे हैं और कुछ भी संभव है। पर ऐसे मामले तभी रुकेंगे जब आमजन आँख कान खोल कर जागरूक हों। घटित घटना के चश्मदीदों को आगे बढ़ कर केस में गवाही देने आना होगा। यदि वे सिर्फ प्रदर्शन ही नही करके गवाही भी देंगे ज्यादा से ज्यादा संख्या में तो निश्चित रूप से पुलिस चाह कर भी आरोपियों को ज्यादा लाभ नही पहुँचा पायेगी। और जब ऐसा होने लगेगा तो भूमाफियाओं-अपराधियों एवं उनके संरक्षकों का वर्चस्व निश्चित रूप से खत्म होगा। ऐसे मामलो में कहीं भी कमी दिखने पर जनआंदोलन की धार को बरकरार रहने पर प्रशासन पर भी निष्पक्षता से कार्य का दवाब बना रहेगा।

