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मुख्य - विशेष - April 4, 2017

पार्टी में जमीन खिसकती देख नये जमीन की तलाश में जुटे संजय सरावागी! Voice of Darbhanga

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दरभंगा। अभिषेक कुमार

दो दिनों पूर्व रविवार को एक कार्यक्रम के दौरान दरभंगा के भाजपा के नगर विधायक संजय सरावागी का राजद के पूर्व सांसद एवं काँग्रेस के एक वर्तमान मंत्री के साथ हंसी ठहाके लगाते दिखना वर्तमान हालत में संजय सरावागी के महागठबंधन की तरफ जाने का इशारा भी कर रहा है। वैसे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी इसे व्यवहारिकता के नाम पर टाल दें। पर वर्तमान हालात में राजनितिक विश्लेषक इसे जरूर गम्भीरता से लेंगे। इसके कुछ प्रमुख कारण भी हैं। इनदिनों पार्टी में कार्यकर्ताओ द्वारा संजय सरावागी का अंदरूनी विरोध अब सोशल मीडिया एवं कार्यक्रमो में अब खुल कर होने लगा है। ऊपर से इनके प्रदेश में बैठे स्वजातीय आका की ताकत भी नए प्रदेश अध्यक्ष के बनने से कमजोर हुआ है और संगठन में इनके आका के विरोधी खेमे को ही ज्यादातर जगह मिली है। उपर से गोपालजी ठाकुर के प्रदेश उपाध्यक्ष बन जाने से इनके विरोधी खेमे को अधिक बल मिल गया है। सर्वविदित है कि गोपालजी ठाकुर को जिलाध्यक्ष बनने से रोकने केलिए संजय सरावागी ने पूरी ताकत लगा दी और जिलाध्यक्ष नही बनने दिया। ये बात गोपालजी ठाकुर के समर्थक भी अच्छी तरह जानते हैं। जातिगत आधार पर यदि बात करें तो दरभंगा में मूल रूप से भाजपा के ब्राह्मण और वैश्य कैडर हैं। जगदीश साह, अमरनाथ गामी, आदि जैसे दिग्गज वैश्य नेतृत्व को भाजपा में खत्म करने का काम संजय सरावागी द्वारा किया जाना भी किसी से छिपा नही है। हर बार वैश्य के नाम पर सीट हथियाने वाले संजय सरावागी को वैश्य महासभा ने भी वैश्य मानने से इंकार कर दिया क्योंकि अबतक इनकी जाति स्पष्ट नही हो पायी है। मारवाड़ को वैश्य महासभा ने एक समुदाय बताया, जाति नही। उनका तर्क था कि मारवाड़ समुदाय में अनेक जातियां होती हैं। इसलिये मारवाड़ी का मतलब वैश्य नही हो सकता। इसप्रकार पार्टी में फिलहाल सबसे कद्दावर वैश्य नेता अशोक नायक भी अशोक यादव और गोपालजी ठाकुर के नजदीकी माने जाते हैं। गोपालजी ठाकुर को तो इन्होंने जिकाध्यक्ष का चुनाव नही जीतने दिया, पर अपने ही दल के अशोक यादव को हराने केलिए फराज फातमी के मदद की चर्चा हवाओ में आयी थी जिसका स्पष्ट कारण फराज फातमी के पिता पूर्व राजद सांसद अली अशरफ फातमी से संजय सरावागी की नजदीकी बताया जाता है।

इस प्रकार वैश्य समुदाय से पत्ता कटने के बाद कोई भी कद्दावर की बात तो दूर, छुटभैये ब्राह्मण समुदाय का नेता भी इनके पकड़ में नही फिलहाल दिखते। जिलाध्यक्ष का चुनाव लड़े एक नेता संजय सरवागी के नजदीकी माने जाते थे और दो दिन पूर्व भी एक जगह इनके साथ नजर आये। पर गोपालजी ठाकुर के प्रदेश उपाध्यक्ष बन जाने के बाद उनकी स्थिति फिलहाल पेंडुलम की हो गयी है। विधायक जी के साथ दिखना नही चाहते कि कहीं उनकी छवि भी खराब न हो जाए, पर विधायक जी का फोन आ गया कहीं चलने को तो रविवार को उन्हें इंकार भी नही कर पाए। हाँ, गिन चुन के तीन – चार छुटभैये ब्राह्मण नेता उनके करीबी ठेकेदारी को लेकर फिलहाल माने जाते हैं जिनमे से दो तो एक ही गाँव के हैं। परंतु हर तरफ विरोध देख कर और गोपालजी ठाकुर के प्रदेश उपाध्यक्ष बनने के बाद वे भी संजय सरावागी के समर्थन के मुद्दे पर चुप्पी लाद लिए हैं। इनके टाइप के नेता बरसाती मेढक जैसे माने जाते हैं। ये किसी भी खेमे में कुछ सिक्कों की बरसात तक ही रुकने वाले माने जाते हैं।

एक बहुत अहम खेमा है युवा वर्ग का शहर में जिसका नेतृत्व इन दिनों भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व जिलाध्यक्ष शिशिर झा करते नजर आ रहे हैं और इनके नगर विधायक के विरोधी होने का आलम यही है कि प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय के आगमन पर नगर विधायक के क्षेत्र में नगर विधायक का नाम लेने वाला कोई नही था और सभी एकतरफ से गोपालजी ठाकुर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। जिला मीडिया प्रभारी अमलेश झा का नगर विधायक से छत्तीस का आंकड़ा सबको मालूम है। हाल में इनके यहां हुए एक निजी आयोजन में भी तमाम भाजपा के प्रमुख नेता नजर आये पर नगर विधायक नही। हाँ, जिलाध्यक्ष हरी सहनी और विधान पार्षद अर्जुन सहनी नगर विधायक के कृपा पात्र माने जाते थे। परंतु बदलती बयार में ये भी कभी कभी साथ तो नजर आ जाते हैं पर विरोधियों पर कोई आवाज अपने नगर विधायक केलिए नही उठाते नजर आते हैं।

इस प्रकार जिला भाजपा में ब्राह्मण और वैश्य समुदाय पर पकड़ खोने के साथ साथ युवाओं का जमीन से लेकर सोशल मीडिया तक पर खुला विरोध देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि अब संजय सरावागी महागठबन्धन में अपनी नयी जमीन तलाश रहे हों। इसमें उनके अच्छे करीबी माने जाने वाले राजद के पूर्व सांसद की मदद सबसे अहम हो सकती है मार्गदर्शन में।

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