Home मुख्य रमजान का पाक महीना शुरू होते ही फ़ैल गया हर तरफ नूरानी मंजर। Voice of Darbhanga
मुख्य - May 27, 2017

रमजान का पाक महीना शुरू होते ही फ़ैल गया हर तरफ नूरानी मंजर। Voice of Darbhanga

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दरभंगा :  आ गया रहमत का साया लेके रमजां आ गया, मोमिनो के वास्ते बख्शीश का सामां आ गया जैसी पंक्तियां क्यों न चरितार्थ होती दिखाई दे जब शहर से लेकर गांव तक के मुसलमान रमजानुल मुबारक के चांद का बेसब्री से इंतेजार कर रहे हों और अरबी कैलेंडर के हिसाब से उनत्तीस न सही तीस को ही अर्थात शनिवार को ही चांद दिख जाये तो फिर ईद जैसी उन्हें खुशी क्यों न हासिल हो. वही हुआ. चांद दिखते ही लोगों ने इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. मरहबा माहे मुबारक मरहबा की सदायें बुलन्द की और अपने रिश्तेदारों से लेकर मित्रों सहकर्मियों को मिल कर और फोन व मोबाइल पर मुबारकबाद भी देते रहे.

दिनचर्या में भी अचानक बदलाव के आसार शुरू हो गये. शाम से ही लोग सेहरी खाने के लिये दूध, सिवईयां, लच्छे व नान वगैरह के इन्तजाम में व्यस्त नज़र आने लगे. रविवार की सुबह फजर की नमाज से पहले सेहरी के तौर पर खाकर रोजा शुरू करेंगे. इसी प्रकार पूरे महीने के रोजे रखेंगे. दिन भर भूखे प्यासे रह कर शाम में मगरिब की अजान के साथ इफ्तार करेंगे. इस महीने का स्वागत व इस्तकबाल केवल वयस्कों ने ही नहीं किया है, बल्कि नन्हे बच्चों में भी रोजा रखने की तैयारी व उमंग देखने को मिल रही है.

इस महीना की खास इबादत नमाजे तरावीह है जो ईशां की नमाज के बाद महीना भर प्रति रात पढ़ी जाती है. इसमें हाफिजे कुरआन कुल बीस रिकअत पढ़ाते हैं. उसमें महीना भर में पूरा कुरआन पढ़ना होता है. इसके लिये जिला भर की सभी मस्जिदों में महीना भर के लिये हाफिजे कुरआन बहाल कर लिये गये हैं. चांद रात से ही नमाजे तरावीह का सिलसिला शुरू हो गया है.

ओलेमाए कराम व इस्लामी विद्वान कुरआन पाक एवं हदीसे नबवी की रोशनी में इस महीने की बड़ी अजमत (बड़ाई) बताते हैं जिसके मुताबिक रमजान का चांद निकलते ही जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं और जहन्नम के दरवाजे बंद हो जाते हैं. इस महीना को अल्लाह ने तीन अशरा (दस दिनों का भाग) में बांटा है. पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत (मोक्ष) का और तीसरा जहन्नम की आग से छुटकारा का है.

इतना ही नहीं इस महीने की हर इबादत व नेकी का सवाब (पुण्य) आम दिनों की ईबादत से सत्तर गुणा बढ़ा कर अल्लाह अता करता है. ओलेमा कहते हैं कि यह महीना दीनी, ईमानी व इंसानी प्रशिक्षण और तरबियत का भी महीना है ताकि महीने भर में जो नेकी और इबादत की आदत बन जाए. उसे साल के अन्य ग्यारह महीनों में भी किया जाए तो उससे खुद का भी भला होता है और समाज का भी भला होता है.  भूखे प्यासे रहने का नाम रोजा नहीं है बल्कि रोजे में तन और मन दोनों की सफाई जरूरी है झूट बोलने, चुगली करने, गीबत (पीठ पीछे बुराई करने) बोहतान (झूठा आरोप), हकमारी करने, किसी पर बुरी नजर डालने या किसी को शारीरिक अथवा मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाने पर व जुबान से बुरी बातें करने से भी रोजा खराब हो जाता है. इसलिये रोजा सब्र, ईबादत और परहेजगारी के साथ ही कबूल होता है. इसमें ज्यादा से ज्यादा कुरआन की तिलावत, पंजगाना नमाज की पाबंदी और सुन्नतों पर अमल करने में ही कामयाबी है. पड़ोसियों और गरीब भाईयों की मदद करना भी इसमें जरूरी है.

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