
ढिबड़ी लेकर खोजने पर भी अपना मेयर प्रत्याशी तक नही मिला चार बार के नगर विधायक को! Voice of Darbhanga

दरभंगा। अभिषेक कुमार
ऐसा कहा जाता है कि प्यार और जंग में सब जायज है। पर उसमे एक नया अध्याय दरभंगा की राजनीति में भी जुड़ गया है। निजी खुन्नस केलिए विरोधी दल का सहयोग भी जायज है। कुछ ऐसा ही नजारा इनदिनों दरभंगा नगर निगम के मेयर पद के चुनाव को लेकर देखा जा रहा है। पिछले दस सालों से मेयर पद पर अपने रिमोट कंट्रोल मेयर रखने वाले भाजपा के चार बार के नगर विधायक संजय सरावागी के इसबार के सभी मेयर पद के संभावित चेहरों को निगम चुनाव में वार्ड पार्षद तक बनना नसीब नही हुआ और सभी बुरी तरह हारे हैं। 2002 के मेयर चुनाव में संजय सरावगी को पटकनी देने वाले ओमप्रकाश खेड़िया की पत्नी वैजंती खेड़िया इसबार महागठबन्धन की मेयर पद की घोषित उम्मीदवार है और इस चुनाव में ज्यादातर महागठबन्धन से जुड़े उम्मीदवार ही जीते हैं जबकि एनडीए का लगभग सूपड़ा साफ हो गया। ऐसे में भाजपा एवं एनडीए द्वारा अपरोक्ष रूप से सरेंडर करते हुए मेयर की दावेदारी से लगभग किनारा किया जा चुका था। पर महागठबन्धन के ही बागी उम्मीदवार राजू मंडल की पत्नी पूजा मण्डल के मेयर चुनाव लड़ने की बात सुनकर तो लगा जैसे नगर विधायक को डूबते समय तिनके का सहारा मिल गया हो। पार्टी से भी बिना विमर्श किये हुए महागठबन्धन के बागी उम्मीदवार पूजा मण्डल को समर्थन की घोषणा कर दी। हलाँकि पार्टी के जिलाध्यक्ष ने पार्टी द्वारा किसी को भी समर्थन देने या मेयर का उम्मीदवार पार्टी के तरफ से होने से अनभिज्ञता जाहिर की। हलाँकि निगम चुनाव में निजी खुन्नस खेड़िया से रहने के कारण उन्होंने वार्ड सात में उनके विरोध में महागठबन्धन के ही प्रत्याशी इश्वर मण्डल का भी समर्थन किया था। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या नगर विधायक केलिए जिला अध्यक्ष एवं जिला कमिटी से विमर्श करना भी जरुरी नही होता जब पार्टी के विधायक होते हुए किसी बाहरी दल को समर्थन देते हैं! पार्टी सूत्रों की माने तो नगर विधायक ने कभी जिलाध्यक्ष के पद एवं जिला कमिटी का सम्मान नही किया क्योंकि जिलाध्यक्ष उनके रिमोट कंट्रोल से चलने वाले माने जाते हैं। इसलिए विमर्श करना तो दूर, खुद कोई भी फैसला ले लेते हैं और उसकी जानकारी तक जिला कमिटी को देना जरूरी नही समझते। कुछ जिला कमिटी सदस्यों द्वारा इसे पार्टी के गरिमा के विरुद्ध भी बताया गया है और इसकी शिकायत प्रदेश अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष तक करने की बात की गयी है।
यह बात भी जगजाहिर है कि नगर विधायक के पास दो तीन पार्षदों के समर्थन के अलावा और कोई पार्षद हैं भी नही इसबार। परंतु वे भी नगर विधायक के कहने पर किसी का समर्थन करेंगे, यह भी मुश्किल लग रहा है क्योंकि समर्थन देने की घोषणा के बाद भी नगर विधायक पार्टी से व्हिप जारी नही करवा पाये हैं अबतक और न ही ऐसा हो सकने की संभावना दिख रही है। इसका प्रमुख कारण जिला कमिटी के प्रमुख सदस्यों का नगर विधायक का मनमर्जी से लिया गया फैसला बताया जा रहा है। वैसे भी मेयर पद का चुनाव पार्टी लाइन पर नही, धनबल के आधार पर अधिकतर होता है और पार्षदों की बोली जो जितना ज्यादा लगा सकता है और जितनी ज्यादा पकड़ है, उसी की जीत मानी जाती है। ऐसे में निश्चित रूप से यदि नगर विधायक ने अपने चिरप्रतिद्वंदी को रोकने केलिए महागठंबधन के शरण में जाने तक से परहेज नही किया तो माना जा सकता है कि धनबल के प्रयोग में भी पूरी ताकत जरूर लगा देंगे।

