
यदि उम्मीदवार भी नही मिला तो क्या भाजपा ने नगर निगम में मान लिया अपना खत्मा? Voice of Darbhanga

दरभंगा। अभिषेक कुमार
दरभंगा नगर निगम के मेयर पद पर महागठबन्धन के उम्मीदवार वैजंती खेड़िया की जीत और भाजपा के नगर विधायक द्वारा समर्थित उम्मीदवार पूजा मंडल की करारी हार ने जिला भाजपा को अजीब पशोपेश में डाल दिया है। करारी हार के बाद भाजपा नेता कह रहे हैं कि भाजपा का कोई उम्मीदवार नही था। नगर विधायक ने उम्मीदवार का निजी तौर पर समर्थन किया था। पर ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नगर निगम चुनाव में भाजपा की ऐसी हालत हो गयी कि वह उम्मीदवार देने के हालत में भी नही था! यदि उम्मीदवार था तो क्या समर्थक एवं प्रस्तावक भी नही थे! क्या इतनी दयनीय स्थिति हो गयी लगातार दस साल से नगर निगम पर वर्चस्व रखने वाली पार्टी का? और यदि नगर विधायक द्वारा समर्थित उम्मीदवार को भाजपा अपना समर्थित उम्मीदवार स्वीकार करती है तो उसे इस करारी हार के जिम्मेवार पक्षो पर भी समीक्षा करनी पड़ेगी। हलाँकि दलील देने केलिए अब यह कहा जा सकता है कि बिहार में पंचायत चुनाव एवं निगम चुनाव दलगत आधार पर नही होता है। पर यह बात जगजाहिर है कि पावर एवं मलाई युक्त मेयर पद पर कब्जा जमाने केलिए हमेशा सभी दल प्रयास करते हैं और पूर्व मेयर गौड़ी पासवान को भी भाजपा अपने पार्टी का ही कहती थी और मेयर भी भाजपा के कार्यक्रमो में भाजपा कार्यकर्ता की तरह तत्पर रहते थे। यहां तक के सुशील मोदी के शहर में हुए कार्यक्रम के दौरान भाजपा ने शहर के प्रथम नागरिक का दर्जा प्राप्त मेयर को कुर्सी तक नही देकर खड़ा रखा था जो काफी चर्चा का विषय बना था। अब इस करारी शिकस्त से पल्ला झाड़ने केलिए भाजपा की तरफ से जो भी दलील दी जाय, पर सार्वजनिक तौर भाजपा के नगर विधायक ने हारे हुए प्रत्याशी पूजा मण्डल को समर्थन की घोषणा की थी। अगर इसे नगर विधायक का निजी समर्थन इसे कहा जाता है तो यह भी जवाब भाजपा को सोचना होगा कि उसकी इतनी दयनीय स्थिति इस चुनाव में क्यों हुई कि वह अपना प्रत्याशी देने के हालत में भी नही थे।
बहरहाल भाजपा की दलील जो भी हो, पर दोनों परिस्थतियों में पार्टी अंदर ही अंदर अपनी शिकस्त जरूर महसूस करेगी और कम से कम अंदरूनी तौर पर हार की समीक्षा किया जाना भी तय माना जा रहा है। चार बार से नगर विधायक पद पर कब्जा और दस साल मेयर पद कब्जा रहने के वाबजूद भाजपा के मेयर खुद अपने वार्ड में भी चुनाव नही जीत पाये और चौथे स्थान पर चले गये साथ ही भाजपा के विधान पार्षद की पत्नी अपने वार्ड में एक हज़ार से अधिक वोट से हार जाती है, और इसके बाद भाजपा को मेयर का प्रत्याशी तक नही मिल पाता है, तो यह कहीं कहीं न कहीं शहर के राजनीति में भाजपा के नेतृत्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह निश्चित रूप से लगाता है।

