
हर पार्टी के युवा नेताओं केलिए अनुकरणीय है बालेन्दु झा की संघर्ष गाथा। Voice of Darbhanga

दरभंगा। अभिषेक कुमार
दरभंगा शहर की राजनीति में वर्षो से भाजपा का प्रभुत्व रहा है जिसे विगत कुछ वर्षों से किसी व्यक्ति विशेष द्वारा निजी प्रभुत्व बना लिया गया था। शहर की सत्ता हो या पार्टी संगठन, सब एक व्यक्ति के इशारे पर रेंगने को मजबूर थे क्योंकि प्रदेश में भी उनके स्वजातीय आका की तूती बोलती थी। पर पार्टी के अंदर ही अंदर अधिकतर नेता स्वयं को अपमानित महसूस करके भी अंदर घुट रहे थे। पार्टी में गलत करने पर भी उस कद्दावर माननीय के खिलाफ बिगुल फूंकने की हिम्मत नही थी। ऐसे में इन सभी असंतुष्टों की आवाज बनकर आये बालेंदु झा “बालाजी”।
बालेंदु झा के पास नगर मंडल में युवाओं की अच्छी खासी टीम थी और सबसे पहला बिगुल बालेन्दु झा ने नगर मण्डल अध्यक्ष का चुनाव लड़कर फूँका। यहां वर्षों से परंपरा थी कि माननीय ने जिसे तय कर दिया, वह बन गया। कोई कुछ नही बोल सकता था। पर बालेन्दु झा ने हिम्मत दिखायी इस परंपरा का विरोध किया। फलस्वरूप पार्टी को लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव करवाने को बाध्य होना पड़ा और यह शहर के माननीय के अहंकार को पहला बड़ा झटका लगा। हलाँकि इससे बौखलौए माननीय ने अपनी पूरी ताकत बालेन्दु झा के खिलाफ झोंक दी। फलस्वरूप बालाजी नगर अध्यक्ष नही बन पाये क्योंकि उस समय विधायक की ताकत चरम पर थी और बालाजी विरोध में टिक पाएंगे या नही, इसका भरोसा सबों को नही हुआ था। पर बालाजी ने माननीय के मर्जी के खिलाफ चुनाव लड़कर अपना परिचय दे दिया और पार्टी के कार्यक्रमो में पहले से अधिक सक्रिय नजर आने लगे। युवा कार्यकर्ताओ का भरोसा बालेन्दु झा पर बढ़ता गया और इनके साथ युवाओं की अच्छी खासी टीम जुड़ती गयी।
पार्टी के जिलाध्यक्ष के चुनाव में बेनीपुर के पूर्व विधायक और वर्तमान में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष गोपालजी ठाकुर की दावेदारी सबसे तगड़ी थी और 29 मण्डल में से 18 मण्डल अध्यक्षो का समर्थन प्राप्त था। पर माननीय ने अपने प्रदेश में बैठे स्वजातिय आका के पास घुटने टेक दिए के किसी भी प्रकार गोपालजी ठाकुर जिलाध्यक्ष नही बनने चाहिए, बल्कि उनका ही विश्वासपात्र बने। फलस्वरूप वहाँ भी चुनाव चयन से नही होकर मनोनयन से हो गया।
इस बात को भी उठाने की हिम्मत बालाजी ने दिखायी। बालाजी ने युवाओं को संगठित किया और चुनाव के पोल खोल को नवनिर्वाचित प्रदेश नित्यानंद राय के दरभंगा दौरे के दौरान कर दिया। बालाजी के प्रयास से युवाओं के साथ साथ पुराने सोये हुए योद्धा भी जागे। प्रदेश अध्यक्ष के दौरे के दौरान करीब एक सौ बाइक के साथ डेढ़ दो सौ लोगों की टोली थी। सबने एक तरफ से दरभंगा के किसी एक नेता का जिंदबाद किया तो वह थे गोपालजी ठाकुर वह भी माननीय के जिले में। यह जिंदाबाद का नारा गोपालजी के पक्ष में होने से ज्यादा माननीय के प्रभुत्व से आजादी की तड़प ज्यादा दिखा रही थी।
इसके बाद नगर निगम चुनाव में बालाजी ने अपने भाई की पत्नी को चुनाव में उतारा और पूरी ताकत से लग गए। पर बालाजी नही जीते, इसमें माननीय ने भी पूरा धन बल लगा दिया जिसमें बालाजी थोड़े कमजोर पड़े। पर फिर भी जब माननीय को लगा कि बालाजी को नही रोक पाएंगे तो उन्ही के बीच में एक गद्दार को खरीद लिया जो उनके अपने थे। माननीय द्वारा तमाम साम दाम दण्ड भेद लगा लेने के वाबजूद बालाजी के उम्मीदवार ने 759 वोट अपने वार्ड में लायी और करीब 100 वोटों से कुछ अधिक वोट से हार गयी। पर यहां भी बालाजी के समर्थकों की संख्या और उत्साह बढ़ा ही क्योंकि सबको पता था कि बालाजी के विरोध में माननीय थे। फिर भी इतना दम बालाजी ने दिखा दिया।
पार्टी के हित में हमेशा कार्य करते रहने वाले पर माननीय के नजर में खटकते रहने के कारण बालाजी को योग्यता रहते हुए भी फिलहाल कोई महत्वपूर्ण पद मिलना मुश्किल है और यह बात बालाजी भी जानते हैं। पर उन्हें पद से मतलब भी नही है। वे बस अपने पार्टी का परचम लहराते देखना चाहते हैं और पार्टी के सभी समर्पित कार्यकर्ताओं को सम्मान मिले, यही उनका लक्ष्य है।
बालाजी भले भाजपा के कार्यकर्त्ता हैं, पर उनका उदाहरण हर पार्टी के युवा कार्यकर्ताओ केलिए एक सकारत्मक उदाहरण होगा कि कैसे पार्टी केलिए जान न्योछावर करने की तमन्ना पाले हुए युवा ने पद या कद का लालच त्याग कर गलत चीज़ों का विरोध किया पर पार्टी के विरोध में कभी नही गये। निश्चित रूप से यह अनुकरणीय उदाहरण है।

