
शहर में ऐसा कोई नाला नही बचा जो अतिक्रमित न हो! Voice of Darbhanga
दरभंगा। अभिषेक कुमार
यह तो शुक्र है भगवान का जो विगत वर्षों में लगातार तेज बारिश नहीं हुई। नहीं तो यह शहर जल प्रलय का शिकार हो जाता। यह बात प्रशासन भी मान रहा है। 19.18 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रफल वाले इस शहर में जल निकासी की सबसे बड़ी समस्या है। पहले शहर का पानी सरल ढंग से बाहर निकल जाया करता था। लेकिन, अब मुश्किल हो गया। जिन खाली जगहों में पानी बहता था, आज वहां आबादी बस गई है। नतीजा यह है कि पानी शहर में ही रह जाता है। ललित नारायण मिश्र पथ से पूरब, दरभंगा टावर, कादिराबाद आदि इलाके का पानी कंगमा गुमटी, अल्लपट्टी पुल संख्या 23 व लहेरियासराय चट्टी चौक से निकलता है। लेकिन, यहां स्थिति पहले जैसी नहीं रही। सामने खाली जगह को उंचे दामों में बेचा जा रहा है। उस पर बड़ी-बड़ी इमारत खड़ी हो गई हैं। जरूरत थी उस भूमि के अधिग्रहण की। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यही हाल पश्चिम वाले भाग का है। ललित नारायण मिश्रा पथ से पश्चिम वाले मोहल्ले का पानी सलाटर हाउस, जिला स्कूल के पश्चिम नासी व सैदनगर से एकमी की ओर जाने वाली अंडर ग्राउंड आउट लेट से बागमती नदी व आस-पास के क्षेत्र से निकलता है। लेकिन, इस इलाके में भी नई आबादी तेजी से बसी है। जानकारों की बात माने तो नालों की सफाई भर से समस्या का निदान संभव नहीं है। बल्कि, शहर से पानी निकल कर कहां जाएगा, इसका पुख्ता प्रबंध करना होगा। तभी जल-जमाव की समस्या से निजात मिल सकता है।
कर लिया गया नाले का अतिक्रमण :
शहर का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा है, जहां का नाला अतक्रमित नहीं है। इसे अतिक्रमित करने वालों में हर तबके के लोग शामिल हैं। अमीर हो या गरीब जिसे जहां मौका मिला उसने अपने आवास के सामने नालों को समेट लिया। कई जगहों का हाल तो ऐसा हो गया है कि नाला की सफाई के दौरान कुदाल तक नहीं डाला जा सकता है। कई घरों व दुकानों के सामने नालों को ढंक दिया गया है। लोग उसके उपर दुकान चलाते हैं। कई ने नाले पर घर बना लिया है। यही कारण है कि कई नालों का अस्तित्व खत्म हो गया है। जानकारों की माने तो बाबादी बढ़ने के बावजूद अगर पुराने नालों को अतिक्रमण मुक्त करा लिया जाए तो समस्या का निदान आसानी से हो जाएगा। भंडार चौक से लेकर बेला मोड़ तक के नाले की बात करें तो नाले पर बड़ी-बड़ी इमारत खड़ी है। दारूभट्टी चौक के पास तिराहा नाला चर्चित था। पूनम सिनेमा रोड में नाला पर ही कई माकान बन गए हैं। यह कहा जा सकता है अतिक्रमण की समस्या से कोई भी नाला अछूता नहीं है।
मुख्य सड़क का नाला पूर्ण नहीं:
शहर के ललित नारायण मिश्र पथ, पीडब्लूयूडी रोड व वीआईपी मुख्य पथ के किनारे बनाए गए नाले का निर्माण आधा-अधूरा किया गया है। कार्य एजेंसी की लापरवाही से मुख्य सड़क का पानी नीचे वाले मोहल्ले में बहता है। जबकि, आस-पास के माहल्ले का पानी उन नालों से बहना चाहिए था।
नहीं है पर्याप्त नाले :
आबादी के अनुपात में शहर में पर्याप्त नाले नहीं है और जो है वह काम के नहीं है। ऐसा नहीं नाला का निर्माण नहीं कराया गया है। विगत आठ वर्षों में नगर निगम की योजना, मुख्यमंत्री शहरी विकास योजना, सांसद, विधायक, एमएलसी कोष सहित कई योजनाओं से करोड़ों रुपये की राशि से नालों का निर्माण कराया गया। लेकिन, गुणवत्ता की कमी के कारण व सही मानक का उपयोग नहीं करने की वजह से अधिकांश नाले ध्वस्त हो गए हैं। जो बच गए हैं वह जाम पड़े हुए हैं। शहर के मदारपुर मौलागंज, खान चौक से उर्दु जाने वाले पथ, बंगाली टोला, बलभद्रपुर, लक्ष्मीसागर, रेलवे कॉलोनी, पूनम सिनेमा रोड आदि सहित कई ऐसे इलाके हैं जहां आज भी लोग पक्के नाले के लिए तरस रहे हैं।
निदान पर चल रहा है मंथन :
शहर में जल जमाव की समस्या गंभीर है, यह जानकारी विभाग को भी है। इसी की तहत पूरे शहर का सर्वे कराया गया। ला मेयर नामक संस्था को इसका डीपीआर बनाने को कहा गया। लेकिन, तीन वर्षों के बाद भी कोई प्रगति नहीं हो पाई। यह कहा जा सकता है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी धरातल पर अब तक कुछ दिखाई नहीं दिया। दोनार से टीनही पुल की ओर जाने वाले बड़े नाला के निर्माण को लेकर एक वर्ष पूर्व स्वीकृत ही नहीं दी गई बल्कि, विभाग की ओर से निधि भी उपलब्ध करा दी गई। इसके बावजूद कार्य शुरू नहीं हो पाया।
आज भी कच्चा नाला :
शहर के अंदर आज भी कच्चे नालों की संख्या अधिक है। आधे से ज्याद जगहों पर यह देखने को मिल जाता है। नालों का मेड़ ध्वस्त होने के कारण अक्सर पानी सड़क पर बहता है। निगम के आंकड़े की बात करें तो अभी भी लगभग 70 किलो मीटर नालों का पक्कीकरण करना है।
संसाधन की घोर कमी :
नगर निगम के पास नाला सफाई करने के लिए एक भी आधुनिक यंत्र नहीं है। 3 जेसीबी, 20 ट्रेक्टर व तीन पंप सेट के सहारे नाले की सफाई की जाती है। संसाधन की कमी के कारण नालों की नियमित सफाई नहीं हो पाती है। निगम के पास स्थाई व संविदा पर कुल 632 सफाई मजदूर हैं। इनके उपर वार्ड की सफाई करने के साथ नालों की सफाई करने की जिम्मेदारी है। यहां तो जरूरत के अनकूल सफाई उपस्कर तक नहीं है। कांटा, कुदाल, बेलचा, बाल्टी, पंजा, बांस, खंती आदि की घोर कमी रहती है।
निकाला गया कचरा नहीं उठाया जाता :
छोटे-छोटे नालों की सफाई तो ऐसे भगवान भरोसे ही होती है। अगर माह में एक बार या दो बार हो भी जाए तो सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। उपर से कचरा को निकालकर किनारे में रख दिया जाता है। लेकिन, उसका उठाव नहीं हो पाता है। नतीजा, यह होता है कि कचरा पुन: नाला में चला जाता है। हर नाला किचड़ से भरा हुआ है। पर अंदर से उसकी सफाई दिन देखकर ही की जाती है।
प्रावधान का होता उल्लंघन :
नए प्रावधानों के अनुसार अब सड़क का निर्माण नाला के साथ होना है। पर एजेंसी बिना इस बात का ख्याल किए सड़क का निर्माण कर रही है। यह जल निकासी में कारगर होगा या नहीं ? इसकी परवाह किसी को नहीं है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी जल जमाव से शहरवासियों को दो चार होना होता है। अगर मौसम के तेवर सख्त हुए तो इस शहर का भगवान ही मालिक है।
नालों की नहीं होती नियमित सफाई :
नालों की सफाई के नाम पर छोटे नालों की सफाई कर महज खानापूरी की जाती है। जिन बड़े नालों से पूरे शहर का पानी बाहर निकलता है। उसकी सुधि साल में तभी ली जाती है जब बरसात का समय आता है। सफाई नहीं होने के कारण बरसाती पानी से शहर को तैरने का खतरा बना रहता है। ऐसी संभावनाओं की गवाही शहर के कई ऐसे नाले दे रहे हैं जो कचरों व जंगलों से भरे हैं।
खर्च करोड़ों में :
शहर को जल जमाव से मुक्ति दिलाने को लेकर निगम की ओर से सालाना कारोडा़ें रुपये खर्च किए जाते हैं। बजट प्रतिवेदन के अनकूल सालाना छह करोड़ से उपर का खर्च नाले पर किया गया है। इसमें कर्मियों का वेतन, उपस्कर, भाड़े के ट्रेक्टर, डीजल, मोबील, मरम्मत आदि पर किए गए खर्च को अंकित किया गया है। लेकिन, नालों की स्थिति देखने के उपरांत खर्च की गई राशि पर हर जानकार सोचने पर मजबूर हो जाता है।

