Home विशेष आखिर कहाँ खो गये वो गाँव जो अपनी अखंड पहचान के साथ देते थे नैतिक शिक्षा! Voice of Darbhanga
विशेष - October 15, 2017

आखिर कहाँ खो गये वो गाँव जो अपनी अखंड पहचान के साथ देते थे नैतिक शिक्षा! Voice of Darbhanga

 

कहाँ गया वो गांव हमारा जहाँ रामलाल हो जब्बार मियां, उनके कंधे पर घूमने वाले बच्चे को पता नही चल पाता था कि अपने दादा नाना है या पराये….

मनुव्वर राणा के शेर के एक लाइन “तुम्हारे शहर में सब मैयत को कांधा नही देते हैं, हमारे गाँव में छप्पर भी सभी मिलकर उठाते हैं” को सहसा ही मेरा भी मन खोजने लगा गाँव में। शनिवार को एक कार्य से दरभंगा के वरीय उपसमाहर्ता रविंद्र कुमार दिवाकर मिलने गया तो सहसा चाय पर गाँव की स्थिति की चर्चा हो गयी। अपना दर्द उन्होंने जो बयां किया, वह हमारे दिल को भी छू गया। पहले गांव में जो एकता थी, वह मिशाल थी। सभी मिलजुल कर रहते थे। किसी के मेहमान आये तो उनसे पूरा गाँव मिलने जाता था। गांव के लोग रोज एक दूसरे से मिलकर खेती बारी की चर्चा करते थे। कोई कहता कि अपना खेत पटा कर एक घण्टे केलिए पम्पिंग मुझे भी देना। कोई कहता मेरा एक बैल बीमार है, तो दूसरा कहता कि मेरा एक बैल ले जाना। फिर अपना जोतने के बाद तनी हमरा भी एक कोला जोतवा देना। आदि आदि चर्चाएं होती थी। बच्चे दादा दादी, नाना नानी से किस्सा सुनाने की जिद करते थे। पारिवारिक संस्कार विकसित होता था। नैतिक शिक्षा मिलती थी। स्कूल में अलग से नैतिक शिक्षा की पढ़ाई होती थी। बच्चों को कहानियां सुना कर पूछा जाता था गुरूजी द्वारा कि इस कहानी से क्या शिक्षा मिली। किसी के बेटी की शादी हुई तो बरात का स्वागत पूरा गाँव मिलकर इसप्रकार करता था कि किसी एक परिवार की नही, गाँव के इज्जत की बात है। कोई बाहर नौकरी भी करता था और छुट्टी में गाँव आया तो पूरे गाँव में जाकर सबसे मिलता था। सब हालचाल पूछते थे।बच्चे भी दादा दादी या नाना नानी के पास समय बिताते थे। अपने दादा नाना हो या अलग बगल के लोग भी हो, बच्चों को कंधे पर बिठाकर गाँव की गली, गाछी, खेत खलिहान घुमाते थे। पुरे गाँव में कोई अंजान नही लगता था।

पर आज के दौर में गाँव का यह स्वरुप विलुप्त हो गया। श्री दिवाकर से जब इसबात पर चर्चा हुई तो लगा कि कहीं न कहीं पंचायत चुनाव की राजनीति ने इस स्वरुप को खत्म करके वैमनस्यता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभायी है। पहले विधायक या सांसद के चुनाव में यदि विरोध भी था तो चुनाव के एक सप्ताह बीतते बीतते सब मामला खत्म। पर अब छोटा सा गाँव और उनमे 6-7 पद और हर पर 10 से 15 उम्मीदवार। खेमेबाजी शुरू। विरोध की राजनीति शुरू। और यह विरोध लगातार खेमे में तब्दील होता गया। गाँव में वैमनस्यता बढ़ती गई। अब जहाँ भी चर्चा होती है तो बस राजनीति की। फलाने ने फ़लाने योजना में नाम कटवा दिया और अपने लोगों का जोड़वा लिया। फिर दूसरा खेमा उसका विरोध। यह विरोध इस हद तक बढ़ गया कि कृषि में मदद, बच्चों को अपना बच्चा समझना, गाँव में किसी के बेटी की शादी है तो सब गाँव के लोगो का मिलकर प्लान करना स्वागत का, गाँव में किसी के यहां मेहमान आये तो सबका उनसे मिलकर हाल जानना, ये सब खत्म हो गया। ये फलाने खेमा का तो वो फलाने खेमा का है, बस यही भावना पनपी। इसके सहयोग में दिखे तो हमारा खेमा नाराज हो जाएगा, यही सब तोड़ने वाली बातें दिल में घर करने लगी। गाँव की एकता और अखंडता छत विक्षत हो गयी। गाँव में सार्वजनिक आयोजन नही, बल्कि राजनीति से प्रेरित आयोजन होने लगे।

गाँव के धरोधर पुराने पीपल और बरगद के वृक्ष भी कटने लगे, जल श्रोत पोखर-तालाब जो पूरे गाँव की पहचान होती थी, भरे जाने लगे। जो भरे नही गये, उसे घेरा जाने लगा, पाबंदियां शुरू हो गयी।

मेरे इस लेख को लिखने का उद्देश्य मात्र आपको उस गाँव की छवि को आपको एकबार पुनः याद दिलाना था। शायद आप अपने गाँव में इस संस्कृति को खोजने और लोगो को बताने का प्रयास करें तो कहीं दुबारा वही गाँव आपको मिल जाए। असम्भव कुछ भी नही है। बस अगर लेख अच्छा लगा तो आप भी इस चर्चा को दूसरों तक पहुंचाए। जैसे आज मेरे दिल को छुआ, हो सकता है आपके दिल को छुए और आप जिसे सुनाएँ, हो सकता है कि उसके दिल को भी छुए। अगर लोगो के दिलो में यह बात जगी तो कोई मुश्किल नही कि हमे हमारा नैतिक शिक्षा सीखाने वाला गाँव फिर मिल जाय।

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