Home मुख्य सवर्णो के खामोश क्रांति की चुनी राह का सफल ट्रायल रहा स्वतः स्फूर्त बन्द। Voice of Darbhanga
मुख्य - April 10, 2018

सवर्णो के खामोश क्रांति की चुनी राह का सफल ट्रायल रहा स्वतः स्फूर्त बन्द। Voice of Darbhanga

दरभंगा: सूचनाओं के प्रसार में सोशल मीडिया एक बड़ा आधार बन चुका है। सोमवार की शाम तक मंगलवार को हुए बन्द का किसी को दरभंगा में इस प्रकार के बन्दी का अंदेशा नही था क्योंकि सामने आकर कोई भी संगठन बन्द करने की बात सार्वजिनक रूप से नही किये थे और न ही मीडिया में ही कोई ठोस खबर इस बात को लेकर थी। कुछ संगठनों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के समर्थन में और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर एकदिवसीय धरना दिया गया जिसकी पूर्व आधिकारिक सूचना थी। परंतु सोशल मीडिया द्वारा भारत बंद की सूचना लगातार संप्रेषित हो रही थी। अधिकतर लोग मान रहे हैं कि इस सूचना का असर ऐसा हुआ कि शहर के सभी प्रमुख विद्यालय, कार्यालय, प्रतिष्ठान आदि स्वतः बन्द रहे। लनामिविवि में मंगलवार को होने वाली पार्ट थ्री की परीक्षा भी रद्द कर दी गयी। बसें भी नही चली। ट्रेन तक को रोका गया। सड़क, गली मोहल्ले तक जाम कर दिया गया। यह पूरा बन्दी किसी के अगुआई या नेतृत्व में न होकर स्वतः स्फूर्त बन्द था। बन्दी के दौरान दरभंगा में कहीं लाठी डंडे लेकर जबरन तोड़फोड़ मचाते दुकानों को बन्द कराते लोग भी नही दिखे। दुकाने स्वतः बन्द रही। बन्द के नेतृत्व में राजनीतिक दलों से जुड़े कुछ चेहरे भले दिख गए हों, परंतु किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल के विधायक-सांसद या जिलाध्यक्ष के प्रतिनिधि भी बन्द के समर्थन में नही दिखे और न ही बन्द के समर्थन में उनका कोई बयान। सबसे बड़ी बात वर्तमान सांसद दरभंगा के कीर्ति आजाद सामान्य जाति से हैं और दरभंगा में रहने के वाबजूद न बन्द के समर्थन में कहीं सड़क पर उतरे और न ही कोई बयान दिया। स्वयम्भू भावी सांसद उम्मीदवार खुद को मानने वाले भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष गोपालजी ठाकुर एवं जदयू महासचिव संजय झा को भी बन्द में शामिल न होने बहाना दरभंगा से बाहर रहने के रूप में मिल गया था। परंतु नितदिन माला चढ़ाने और टोपी पहनाने तक की हर पोस्ट सोशल मीडिया में पोस्ट करने वाले इन नेताओं ने बन्द के समर्थन में एक पोस्ट तक नही किया जबकि इनका आधार वोट सवर्ण वोट ही है।
बिना किसी बड़े राजनीतिक समर्थन और नेताओं की अनदेखी के वाबजूद बन्द का पूर्णतः शांतिपूर्ण सफल हो जाना कहीं न कहीं सामान्य वर्ग के अंदर छुपे कुंठा के दर्द को दिखा जरूर गया। राजनीतिक अपेक्षा के शिकार होने के वाबजूद के सामान्य वर्ग के मौन एकता जिसप्रकार बन्द को सफल करा दिया, यह आने वाले दिनो में राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। प्रबुद्ध नागरिकों जिनमे डॉक्टर, वकील, अधिकारी, बड़े बिजनेसमैन स्तर के लोग भी शामिल थे, उनसभी का एकमत दिखा कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जो राजनेता खुल कर सवर्णो के हित में बोल नही सकता, वह उनका नेता नही हो सकता। चुनाव से पूर्व मौन एकता को कायम रखते हुए राजनीतिक दलों में भी अपना प्रतिनिधि स्वयं बनाने केलिए सभी प्रबुद्ध बुद्धिजीवी तन मन धन से प्रयास करेंगे और अपने प्रतिनिधि को ही इसीप्रकार विजय बनाएंगे। एक बड़ी बात यह तय हुई कि राजनीतिक दलों द्वारा हमारे एकता को तोड़ा न जाय, इसलिए कई स्तर पर टीम संरचना का खाका भी तैयार हुआ है जिसकी जानकारी लीक होने की संभावना भी नही के बराबर है और यदि सिस्टम ऐसा बनाया गया है कि यदि कहीं कोई लूप होल बनाने का प्रयास भी किया जाता है तो वह तुरंत सामने आ जायेगा। व्यवसाय-पेशे से जुड़े गैर राजनीतिक लोगो ने इस पूरे अभियान में हरप्रकार का समर्थन देने का निश्चय दिखाया। मंगलवार की बन्दी के पूर्व भी प्रतिष्ठानों के स्वतः बन्द रखने की तैयारी की गई थी। इसप्रकार कहा जा सकता है मंगलवार का बन्द कि सवर्णो के मौन क्रांति का सफल परीक्षण रहा।

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