Home मुख्य रेयर ब्लड ग्रुप वाले मासूम की जान बचाने केलिए रोजा तोड़ अशफाक ने पेश की इंसानियत की मिसाल। Voice of Darbhanga
मुख्य - May 28, 2018

रेयर ब्लड ग्रुप वाले मासूम की जान बचाने केलिए रोजा तोड़ अशफाक ने पेश की इंसानियत की मिसाल। Voice of Darbhanga

दरभंगा: इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए एक मुस्लिम लड़के ने रोजा तोड़ अपना खून देकर एक हिन्दू परिवार के बच्चे की जान बचाई। बिहार के दरभंगा जिले में सशस्त्र सीमा बल के जवान रमेश कुमार सिंह की पत्नी आरती कुमारी ने दो दिन पहले एक निजी नर्सिंग होम में आपरेशन के बाद एक लड़के को जन्म दिया, जन्म के बाद से ही बच्चे की हालत बिगड़ने लगी जिसके बाद उसे आईसीयू में रखा गया।
जांच के बाद चिकित्सकों ने बच्चे को बचाने के लिए खून चढ़ाने की सलाह दी लेकिन बच्चे का ब्लड ग्रुप ‘ओ नेगेटिव’ रेयर होने के  कारण अभिभावकों के तमाम प्रयासों के बावजूद खून उपलब्ध नहीं हो पाया रहा था। इधर, बच्चे की हालत पल पल और खराब होती जा रही थी  पीड़ित परिवार को कुछ नहीं समझ आ रहा था।
पीड़ित परिवार वालों ने बच्चे को बचाने के लिए पूरे विवरण के साथ ब्लड ग्रुप की जानकारी सोशल मीडिया फेसबुक पर पोस्ट की। दूसरी तरफ सशस्त्र सीमा बल के बटालियन के अलग अलग जगहों पर भी खून की जरुरत को पूरा करने के लिए मैसेज भेजा गया। फेसबुक पर दिये गये को मैसेज को समान ब्लड ग्रुप वाले मो. असफाक ने पढ़ा और उसने तुरंत ही फेसबुक के जरिए चैट कर पीड़ित परिवार से संपर्क कर मदद का भरोसा देते हुए खून देने के लिए दरभंगा अस्पताल पहुंच गया।
बच्चे के अभिभावकों के चेहरे की खुशी तब अचानक गायब हो गयी जब ब्लड बैंक के चिकित्सक ने अशफाक का खून लेने से साफ़ तौर पर इंकार करते हुए कहा कि रोज़े में भूखे होने के कारण इनका खून नहीं निकाला जा सकता। अशफाक के लिए यह चुनौती भरा समय था क्योंकि एक तरफ बच्चे की  जिंदगी बचाने की जंग तो दूसरी तरफ अपने धर्म के प्रति सच्ची आस्था। अशफाक ने चिकित्सक से कई बार खून लेने का आग्रह किया, लेकिन जब उन्होंने साफ इंकार कर दिया तो इस असामान्य परिस्थिति को देखते हुए युवक ने बच्चे की जान बचाने का फैसला किया।
अशफाक ने रोजे को तोड़ कर अस्पताल में ही पहले कुछ खाया और फिर बच्चे की जिंदगी बचाने के लिए खून देकर मानवता की मिसाल कायम की। नवजात बच्चे के लिए अपना खून देनेवाला अशफाक ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘ रोजा तो फिर कभी रख लेंगे, पर जिंदगी किसी की लौट कर नहीं आती। मुझे गर्व है कि आज खुदा ने मुझसे यह काम करवाया है। इस बात से भी कोइ फर्क नहीं  पड़ता की नवजात किस जाति या धर्म का है।’
इधर, पीड़ित नवजात के परिवारवाले भी खून की जरूरत पूरी होने के बाद बेहद खुश ही नहीं बल्कि खून  देकर बच्चे को नई जिंदगी देनेवाला अशफाक अब इस परिवार के लिए भगवान जैसा  है। बच्चे के दादा-दादी ने मीडिया को बताया कि उन्हें इस बात से कोई एतराज नहीं कि उनके हिन्दू होने के बाद भी उनके पोते को कोई मुसलमान खून दे रहा है। अशफाक की वजह से उनके घर का चिराग बुझने से बच गया।

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