Home मुख्य ज्ञान का डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर है मिथिलांचल की भूमि: सुनील चौधरी। Voice of Darbhanga
मुख्य - August 25, 2018

ज्ञान का डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर है मिथिलांचल की भूमि: सुनील चौधरी। Voice of Darbhanga

दरभंगा: मिथिलांचल की धरती ज्ञान का डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर है। और शिक्षा का दान सर्वोत्तम दान है।
उपरोक्त बातें जदयू के बेनीपुर विधायक जदयू के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील चौधरी ने कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्विद्यालय के दरबार हॉल में शनिवार को शुरू हुए संस्कृत सप्ताह के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान बतौर बतौर विशिष्ट अतिथि कहीं। इस दौरान तीन विद्वान भी सम्मानित किये गए।
विधायक श्री चौधरी ने कहा कि शिक्षा का दान सर्वोत्तम सेवा है। सम्भव है कि इसमें मनोनुकूल आर्थिक उपार्जन न होता हो फिर भी इससे आत्म सन्तुष्टि तो अवश्य मिलती है। शिक्षा के ऐसे दानवीर को भगवान भी संजीदगी से देखते हैं।मिथिलांचल को ज्ञान का डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर बताते हुए विधायक ने कहा कि भाषा से ही किसी संस्थान व संस्था की पहचान होती है। इसलिए संस्कृत जितनी ज्यादा विकसित होगी हमारी संस्कृति भी उतनी ही प्रखर व मजबूत होगी।
विधायक ने आगे कहा कि शिक्षक का स्थान समाज में बहुत ऊंचा है।इतिहास गवाह है कि जब कभी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व संस्थागत संकट व समस्याएं आती हैं तो शिक्षकों की भूमिका सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। आज भी हम सभी का सांस्कृतिक क्षरण तेजी से हो रहा है। इसलिए गुरुवरों व प्रध्यापकों से विनम्र निवेदन होगा कि इस मायाजाल से समाज को बाहर निकालें एवम उचित रास्ता भी दिखाएं।
उन्होंने स्प्ष्ट रूप से स्वीकार किया कि देववाणी संस्कृत को एक विशेष वर्ग के साथ सीमित कर दिया गया है। इस क्षेत्र के शिक्षकों को उचित सम्मान व वेतन नहीं मिल पा रहा है। लगे हाथ विधायक ने संस्कृत के बढ़ावे के लिए हर सम्भव मदद की पेशकश भी कर दी। उन्होंने कहा कि वे इतिहास के छात्र रहे हैं। इसलिए हमेशा भूतकाल से सीख लेकर वर्तमान सवांरने का काम करता हूँ। इसी मिथिलांचल से आते भी हैं। जो कहते हैं वो करके दिखाते हैं। सभी स्तरों पर वे साथ चलने को तैयार हैं, आप सभी आजमा कर तो देखिए।
वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो0 सर्व नारायण झा ने कहा कि आज का दिन संकल्पों का दिन है। खासकर शिक्षक, छात्र व गवेषक संकल्पित होकर संस्कृत व संस्कृति की जीवंतता के लिए कार्य करें। यहां सम्भावनाएं अनेक हैं।सिर्फ व सिर्फ उसे निखारने की जरूरत है। वीसी ने नवागुंतक शिक्षकों के बीच ‘ ग्रहस्पष्टीकरणम विषय पर हुए सफल शास्त्रार्थ पर हर्ष व्यक्त किया और श्लोक पढ़ कर कहा कि बच्चे भी कुशल विद्वान हो सकते हैं। उन्होंने नियमित रूप से शास्त्रार्थ जारी रखने की वकालत की। बता दें कि आज के शास्त्रार्थी थे उत्तर पक्ष से वरुण कुमार झा एवम पूर्व पक्ष से विकास। दोनों ज्योतिष के शिक्षक हैं।
मौके पर प्रोवीसी प्रो0 चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि संस्कृत को महज पूजा – पाठ व कर्मकांड की भाषा समझना आज के दौर में सबसे बड़ी भूल होगी। संस्कृत देववाणी होकर भी विज्ञान की भाषा है। संस्कृत के अनुरागियों से उन्होंने अपील करते हुए कहा कि समय आ गया है इसे विज्ञान से जोड़कर ही व्यापकता मिल सकती है। खुशी की बात है कि हमारे कुलपति इस ओर अग्रसर भी हैं और छात्रों के साथ गवेषकों को वे ऐसा करने में उत्साहित भी कर रहे हैं। प्रोवीसी ने कहा कि विदेशों में संस्कृत शिक्षा के प्रति एक गजब का नवउत्साह देखा जा रहा है।अब हमें भी संकल्पित होकर इस मामले में नया करना होगा तभी संस्कृत समृद्ध होगी और जनमानस में पैठ कर चुकी गलत अवधारणाएं निर्मूल होंगी।
उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि प्रो0 शशिनाथ झा के संचालन में हुए कार्यक्रम में इसके पूर्व सरस्वती व भगवती के चित्रों पर माल्यार्पण के साथ वरुण कुमार झा व अखिलेश मिश्र द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया। निशा, अनुपम, रखी,गुड्डी, वीणा, राजन, रंजय, चन्दन, दीपक, पंकज, श्यामनन्दन व भवेश ने मिलकर कुलगीत गया।स्वागत भाषण डॉ विद्येश्वर झा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डीन प्रो0 शिवाकांत झा ने किया। दूसरे सत्र में क्विज भी आयोजित की गई।आयोजन समिति के संयोजक प्रो0 श्रीपति त्रिपाठी, प्रो0 सुरेश्वर झा, प्रो0 चौठी सदाय, डॉ दिलीप कुमार झा, डॉ हरेंद्र किशोर झा, डॉ विनय कुमार मिश्र, डॉ पुरेन्द्र वारिक, डॉ दयानाथ झा, डॉ रामप्रवेश पासवान,डॉ सत्यवान कुमार, डॉ शैलेन्द्र मोहन झा, डॉ तेजनारायण झा समेत सभी कर्मी मौजूद थे। तकनीकी व्यव्यस्था की जिम्मेदारी सूचना वैज्ञानिक नरोत्तम मिश्रा के साथ पवन सहनी व सतीश कुमार ने निभाई।
संस्कृत सप्ताह दिवस के आगाज होते ही दरबार हॉल में संस्कृत के तीन विद्वानों को सम्मानित किया गया। ऐसे विद्वानों में उजान धर्मपुर लोहना निवासी साहित्य के पुरोधा महाकवि आचार्य रामजी ठाकुर , सरिसावपहि निवासी आचार्य शशिशेखर झा तथा करकौली निवासी ज्योतिषाचार्य देवानन्द झा शामिल हैं। सभी विद्वानों ने अपने अनुभवों व विचारों को रखा।

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