
संग्रहालय को मिले मौर्य काल से लेकर पालकाल तक के दुर्लभ पुरावशेषों का प्रलेखन कार्य शुरू।
दरभंगा: प्रसिद्ध साहित्यकार, इतिहासकार एवं पुराविद डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन के कुमार संग्रहालय, हसनपुर, जिला-समस्तीपुर से महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा को प्राप्त पुरावशेषों का प्रलेखन, प्रकाशन एवं प्रदर्शन कार्य प्रारंभ हो गया है। बिहार के संग्रहालयों के पूर्व निदेशक एवं प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. उमेश चंद्र द्विवेदी ने मौनजी के कुमार संग्रहालय से प्राप्त पुरावशेषों का गहन अध्ययन कर बताया कि मौनजी का संग्रह दुर्लभ है जिसमें मौर्य काल से लेकर पालकाल तक की मिट्टी से निर्मित टेराकोटा मृण्मूर्तियां शामिल हैं। मानव एवं पशुओं की मृण्मूर्तियों के साथ साथ खिलौने की गाडियों तथा अन्य सामग्रियों का संकलन विलक्षण है। अधिकतर सामग्रियां शुंग कुषाण कालीन हैं तो कुछ गुप्त काल की भी है। पालकालीन मृण्मूर्तियों की बनाबट भी उत्तम किस्म की है जिससे तत्कालीन समाज के रहन सहन,वस्त्राभूषण आदि के विषय में विस्तृत सूचना मिलती है। मिथिला के इतिहास लेखन में इन सामग्रियों से बहुत ही सहयोग मिल सकता है।
कुल 103 टेराकोटा सामग्रियों का अवलोकन करते हुए डा द्विवेदी ने कहा कि बुद्ध एवं मैत्रेय की टेराकोटा मूर्ति अत्यंत कलात्मक है लेकिन यह कहना कठिन है कि ये मृण्मूर्ति मौनजी को कहा से मिली थी। संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. शिव कुमार मिश्र ने बुधवार को कहा कि बिहार में डॉ.
द्विवेदी जैसे जानकर एवं अनुभवी मूर्ति विशेषज्ञ एवं पुराविद अभी दूसरा नहीं है। इसीलिये इनकी विशेषज्ञता का लाभ प्राप्त करने हेतु इन्हें आमंत्रित किया गया है और उनके द्वारा एक-एक पुरावशेषों को गंभीरतापूर्वक अध्ययन करते हुए प्रलेखन कार्य में सहयोग दिया गया है।
डॉ. मिश्र के अनुसार 103 टेराकोटा सामग्रियों के साथ ही 14 पत्थर की मूर्ति मिली है जो दुर्लभ है। इनमें पार्वती (दशमी-ग्यारहवीं शताब्दी), कुबेर, बुद्ध (बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी), विष्णु (ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी), मकर, महिषासुरमर्दिनी (तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी) आदि की मूर्ति विलक्षण हैं। इसमें आठवीं-नौमी शताब्दी से लेकर चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी तक की पाषाण मूर्तियों का संग्रह है। इनके अलावा सात लकड़ियों की, दो धातु की, तीन शीशे के पुरावशेषों के साथ ही 218 डाक टिकटों का संकलन है जो विभिन्न कालों का है। प्रलेखन कार्य पूर्ण होने के बाद इसे एक बुकलेट के रुप में प्रकाशित किया जायेगा जिसमें स्व. मौनजी की संक्षिप्त जीवनी भी अंकित की जायेगी। पुरावशेषों के विषय पर चर्चा करने के लिए प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष डॉ. उदय नारायण तिवारी, मूर्ति विशेषज्ञ डॉ. सुशांत कुमार, दीर्घा सहायक चंद्र प्रकाश, मुरारी कुमार झा, पूर्णिमा कुमारी, फवाद गजाली, एनआरएलसी, लखनऊ के संरक्षण विशेषज्ञ आविष्कार तिवारी, आरुषि मेहरा, अनुपमा दास, संयुक्ता आचार्य, अंजली शर्मा एवं महेश कुमार के अलावा रत्नेश कुमार वर्मा, धर्मेंद्र कुमार, अशोक कुमार यादव आदि अनेक धरोहर प्रेमियों द्वारा भाग लिया गया।

