
उर्दू विभाग की ओर से शोध पद्धति विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन।
दरभंगा: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पीजी उर्दू विभाग की ओर से ‘शोध पद्धति’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के दूसरे दिन अंतिम तकनीकी बैठक गुरुवार को हुई। इसमें प्रसिद्ध शोधकर्ताओं ने भाग लिया। अनुसंधान और समालोचना विशेषज्ञों ने अनुसंधान किया।
विश्वविद्यालय उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. मो. आफताब अशरफ ने कहा कि शोध की गुणवत्ता और मिन्हाज को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत है। अत: सभी शोधकर्ताओं को आधुनिक परिस्थिति को ध्यान में रखकर शोध करना चाहिए। दूसरे तकनीकी सत्र में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के आलोचक और लेखक प्रो. सगीर एफ रहीम ने कहा कि विद्वान को अपने अध्ययन के आधार पर प्रामाणिक साक्ष्य और विश्वसनीय सामग्री के आलोक में अपनी बात और शोध के परिणाम को इंगित करना चाहिए। ऐसे भी शोध को एक आधिकारिक संदर्भ का दर्जा प्राप्त होता है।
जम्मू विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. रियाज ने शोध और प्रारूपण से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि एक शोधार्थी को हर विषय पर शोध की योजना नहीं बनानी चाहिए, बल्कि
अपना मन बनाना चाहिए। शोध प्रबंध के प्रारूपण और अध्याय पर ध्यान देने के साथ प्रासंगिक सामग्री तक पहुंचने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सुलभ होना चाहिए। माध्यमिक संदर्भों से बचना चाहिए।
प्रो. अरशद मसूद हाशमी ने कल्यात और दावैन की व्यवस्था के मूल बिंदुओं और पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि एक शास्त्रत्त्ीय कवि के पाठ के संकलन के दौरान सभी प्राचीन और आधुनिक पांडुलिपियों का उपयोग किया जाना चाहिए। अपने अध्ययन और शोध को पटल पर रखना बहुत जरूरी है, नहीं तो शोध एकतरफा हो जाएगा। प्रो. गोपी रमन प्रसाद सिंह, डीन, फैकल्टी एवं अध्यक्ष, समाजशास्त्रत्त् विभाग ने शोध पद्धति की व्याख्या करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद के शोध का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन के स्तर पर शोध की गुणवत्ता को बढ़ाया जाए, इसलिए कि उत्कृष्ट और गुणवत्तापूर्ण शोध का मॉडल सामने आ सके।
प्रतिकुलपति प्रो. डॉली सिन्हा ने ऐसे कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा कि कार्यशाला बहुत महत्वपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण है। तकनीकी बैठक की अध्यक्षता डॉ. मो. खालिद अंजुम उस्मानी ने की। उन्होंने कहा कि ऐसा आयोजन भविष्य में भी विभाग द्वारा किया जाता रहेगा।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं छात्रों सहित विभाग के सभी विद्वानों ने भाग लिया। कार्यशाला में उपस्थित शिक्षकों, कवियों, लेखकों और उर्दू मित्रों में डॉ. इफ्तिखार अहमद, डॉ. वसी अहमद शमशाद, डॉ. अब्दुल रफी मौजूद थे।

