
मिथिला के लोग सभ्यता, संस्कृति और संस्कार से धनी : प्रति कुलपति।
दरभंगा: भाजपा के पूर्व महासचिव संजय विनायक जोशी ने कहा कि मिथिला विद्वानों व श्रमिकों का खादान है। जहां विद्वता और श्रमिक का गठजोड़ हो वहां का विकास कभी बाधक नहीं बन सकता है। उन्होंने कहा कि मिथिला इस देश के लिए विद्या का पावन क्षेत्र रहा है जहां शत्रु भी समाहित हो जाता है। मिथिला में ऐतिहासिक संस्कृति रही है, जहां पवित्र नदियों का संगम रहा है। हमें सोचना चाहिए कि हम आखिर पीछे क्यों है? अगर हम दलगत टीका टिप्पणी से उठकर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे तो निश्चित रूप से हमारे क्षेत्र, राज्य और देश का विकास होगा। वे सोमवार को शहर के एक होटल में वैदेही फाउंडेशन एवं ईसमाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘मिथिला का विकास : चुनौती एवं संभावनाएं’ विषयक सेमिनार में बोल रहे थे।
मौके पर कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शशि नाथ झा ने कहा कि मिथिला में पहले से हॉस्पिटल, सड़क की सुविधा में विकास हुआ है। लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है । इसका प्रमाण इसी से दिया जा सकता है कि एक समय में मिथिला में लोग बिस्टी धारण करते थे और आज परिपूर्ण परिधान पहनते हैं। अगर चुनौती के रूप में विकास को देखें तो मिथिला में उच्च शिक्षा उदासीन बनी हुई है जिसका कारण है कि आज उच्च शिक्षा में शिक्षकों का हजारों पद खाली पड़ा है।आज मिथिला में उद्योगों की स्थिति नदारद है जिससे मिथिला के मजदूर पलायन का दंश झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज बाढ़ जैसी विभीषिका के लिए हर गांव में बाढ़ से पहले बड़े बड़े प्लेटफॉर्म बनने चाहिए जिससे बाढ़ के समय पलायन को रोका जा सकता है।

संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति प्रो. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने कहा कि मिथिला जनक की धरती,मां जानकी सीता की जन्मभूमि रही है। यहां के लोग सभ्यता, संस्कृति और संस्कार से धनी रहे हैं। संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा सत्येंद्र नारायण सिंह ने कहा कि दरभंगा एयरपोर्ट मिथिला के विकास में अहम भूमिका निभाएगा। मिथिला में पर्यटन की असीम संभावनाएं बन रही है।
संस्कृत शिक्षा बोर्ड बिहार, पटना की पूर्व अध्यक्षा डॉ भारती मेहता ने कहा कि मिथिला के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि मिथिला पूर्व की भांति मछली निर्यात में अव्वल बने। इसके लिए गांव गांव में पोखर को बचाना होगा। मिथिला के पर्यावरण तंत्र के संरक्षण पर ध्यान देने की जरूरत है। मिथिला से बाहर मैथिल एक पहचान साबित हो, सभी वर्गों के लिए और इसकी भाषा को संरक्षण मिले। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के मानविकी संकायाध्यक्ष मैथिली विभाग के प्रो. रमन झा ने कहा कि मिथिला का अतीत अगर देखा जाए तो मिथिला विद्या का केंद्र रहा है। देश-विदेश से लोग यहां आते थे।

