
शरद पूर्णिमा पर लगमा में आयोजित गोष्ठी में पहुंचे संजय झा, कहा- आश्रम को विद्यापीठ बनाने की करेंगे पहल।
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दरभंगा: शरद पूर्णिमा के मौके पर तारडीह प्रखंड के लगमा स्थित प्रसिद्ध जदगीश नारायण ब्रह्मचर्य आश्रम में मिथिला के विद्वानों का जमावड़ा लगा। इस मौके पर संस्कृत संस्कृति के संरक्षण संवर्धन और वृत्ति निर्माण में इस आश्रम के योगदान पर संगोष्ठि आयोजित की गई। इस कार्यक्रम को बिहार सरकार के जल संसाधन सह सूचन और जनसंपर्क विभाग के मंत्री संजय कुमार झा ने भी संबोधित किया। उन्होंने यहां अपने ऐच्छिक कोष से निर्मित एक छात्रावास के साथ-साथ चाहरदिवारी और द्वार का लोकार्पण भी किया। साथ ही उन्होंने लगमा आश्रम को विद्यापीठ बनाने के लिए बिहार से लेकर केंद्र सरकार तक पहल करने की बात कही है।
मैथिल विद्वानों को संबोधित करते हुए संजय झा ने संस्कृत को रोजगार से जोड़ने की आवश्यक्ता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने पूर्णिमा के महत्व के बारे में भी बताया। श्री झा ने कहा कि आज हम शरद पूर्णिमा के दिन लगमा के इस पवित्र आश्रम में इकट्ठा हुए हैं। हिंदू धर्म में पूर्णिमा का काफी अहम स्थान है। विज्ञान भी मानता है कि इस दिन पृथ्वी चंद्रमा के सबसे नजदीक होती है। शास्त्रों के मुताबिक चंद्रमा हमारे मनुष्य के मन को शांत करता है।’
पूर्णिमा की रात के चांद के महत्व के बारे में बताते हुए उन्होंने देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से जुड़ी एक कहानी के बारे में भी लोगों को बताया। श्री झा ने कहा कि कलाम साहब कहा करते थे कि वह पूर्णिमा की रात को जरूर 2-3 घंटा खुले आसमान के नीचे में बिताते थे। इस प्रक्रिया से उनका मन काफी शांत रहता था। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका यह सिलसिला जारी रहा है। कलाम साहब को उनके पिता ने यह सीख दी थी। उनके पिता को रामेश्वर मंदिर के साधुओं ने पूर्णिमा रात के चांद के महत्व के बारे में बताया था। कलाम साहब के पूर्वजों को रामेश्वर मंदिर के प्रथम प्रसाद ग्रहण करने का भी अधिकार प्राप्त था।

लगमा आश्रम के योगदान का जिक्र करते हुए मंत्री श्री झा ने कहा कि 21वीं सदी में भी इस आश्रम ने गुरुकुल की परंपरा को जीवंत रखा है। इस भौतिक युग में भी यह आश्रम वैदिक और संस्कृत की शिक्षा के प्रसार में जुटा हुआ है। आज भी यहां के बटुक भिक्षाटन कर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। मुझे अत्यंत खुशी है कि मैं आज उनके लिए एक छोटा सा प्रयास कर पाया। उनके लिए एक छात्रावास की व्यवस्था की।
संस्कृत को रोजगार से जोड़ने की अपील करते हुए मंत्री ने लोगों से इस भाषा से जुड़े पेशे को लेकर धारना बदलने की अपील की। उन्होंने कहा कि हमें यह समझना होगा कि संस्कृत रोजगार की एक भाषा है। आज के समय में दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर हों या फिर कैलिफोर्निया जैसा अमेरिका का शहर, पंडितों के पास रोजगार है। आज का जमाना टेक्नोलॉजी का है। भारत में बैठकर पंडित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विदेशों में भी पूजा कराते हैं। उनके पास नंबर लगा होता है। उन्होंने आगे कहा, ये पंडित कौन हैं? ये हमारे-आपके बीचे के ही लोग हैं। इसलिए हमें इनके प्रति धारना बदलने की आवश्यक्ता है। यह रोजगार के एक जरिया है।
संजय झा ने इसके अलावा संस्कृत के विद्वानों से इस विषय को और भी भिन्न रोजगारों से जोड़ने के लिए मंथन करने की अपील की। उन्होंने इस क्षेत्र में रिसर्च की आवश्यक्ता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सरकार आती-जाती रहती है। लेकिन विद्वानों की विद्वता स्थाई है। उनकी राय सरकारों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण रखती है। अगर कुछ तथ्यात्मक बातें इस आपकी तरफ से निकलकर आती है तो मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि मैं अपनी शक्ति के मुताबिक इसे सरकार में रखूंगा।
इस मौके पर संजय झा ने कहा कि मुझे सांस्कृतिक विरसातों के विकास को लेकर काम करने में एक अलग आनंद की अनुभूति होती है। जैसे संस्कृत है वैसे ही मैथिली हमारे संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। मैंने मिथिलाक्षर को लेकर काफी ठोस पहल भारत सरकार में किया था। कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पंडित शशिनाथ झा भी इसके गवाह हैं। मैंने केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मिथिलाक्षर के संरक्षण और संवर्धन को लेकर एक कमेटी गठित करवाया था। इसमें मिथिला के चार विद्धानों ने अपनी-अपनी राय दी है। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार में दे दी है। इस रिपोर्ट पर कार्रवाई का इंतजार है। जल्द ही मैं इस मामले को लेकर इस विभाग के मंत्री से मिलूंगा और इसपर ठोस कार्रवाई की कोशिश करूंगा।
मिथिला की धरती को उर्वर बताते हुए संजय झा ने इस मौके पर कई विद्वानों को याद किया। मंत्री ने कहा कि इस धरती पर उदयनाचार्य, मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र, भारती, कुमारिल भट्ट, गंगेश उपाध्याय, विद्यापति, शंकर मिश्र, पक्षधर मिश्र, खंडवाला राजवंश के पहले महराजा महेश ठाकुर, बच्चा झा जैसे विभूतियों ने जन्म लिया। उनकी विद्वता आज भी हमारे बीच ग्रंथों के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ये नाम अंतिम नहीं हैं। और भी कई विद्वान इस धरती ने दिया है। यहां की जमीन इस मामले में काफी उर्वर है। इसे यहीं नहीं थमने देना चाहिए। आवश्यक्ता है इसे नई पीढ़ि में ट्रांसफर करने की। 
इस कार्यक्रम को संस्कृत विश्वविद्यायल के कुलपति पं. डॉ. शशिनाथ झा और जदगीश नारायण ब्रह्मचर्य आश्रम लगमा के आचार्य और कार्यक्रम के आयोजग कृष्ण मोहन दास ब्रह्मचारी ने भी संबोधित किया।

