
पूजा पर दिख रहा है आधुनिकता का असर। Voice of Darbhanga

सौजन्य: ए0 जिलानी
दरभंगा: मिथिला शक्ति-आसना का पर्व मुख्य रूप से अंतर्मुखी-साधना के लिए जाना जाता है. यहां वर्ष के चार नवरात्रों में साधक पूरी तन्मयता से माता की साधना करते है. परंतु बदले हुए परिवेश का असर विगत 3 दशको में देखा गया. आधुनिककरण का असर चकाचौंध के बीच मां दुर्गा की पूजा अराधना भव्य पंडालो में की जाने लगी. धीरे-धीरे इसका असर बढ़ता गया है. वर्तमान समय में यह प्राय: सार्वजनिक पूजा स्थलो में देखने को मिलता है. हालांकि अभी भी दरभंगा में व्यक्तिगत दुर्गापूजा की परंपरा समाप्त नहीं हुई है. वहीं इन सब के बीच बंगाली समाज द्वारा किये जाने वाले दुर्गापूजा का अलग ही महत्व है. इस बार दुर्गापूजा और मुर्हरम का पर्व एक साथ होने के कारण प्रशासनिक चौकसी बढ़ी हुई है. सभी पूजा पंडलो में दंडाधिकारी के साथ पुलिसबल की प्रतियुक्ति की गई है. हथिया नक्षत्र में हुई हल्की बारिश से मेले का सौन्दर्य कुछ फीका जरूर पड़ा है. अष्टमी तिथि को ही पूजा-पंडालो में भीड़ अपेक्षा के अनुसार बहुत कम नजर आयी. उसका एक कारण यह भी है कि मौसम ठीक नहीं होने के कारण ग्रामीण इलाके से जो लोग मेला देखने आते है, उनलोगों को शहरी इलाके में नहीं देखा गया. साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह होने वाले दुर्गापूजा की स्थानो की सजावट आधुनिक रूप में संपन्न की गयी है. इस कारण भी ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने नजदीक के पूजा-पंडालो में ही पहुंच कर दुर्गापूजा का आनंद उठाते देखे जा रहे है. इधर शहर और ग्रामीण क्षेत्रो में दरभंगा और मधुबनी जिला में कई देवी स्थान है. जहां पीढ़ी दर पीढ़ी से लोगों का आना-जाना है. खासकर इस नवरात्रा में गांव छोड़कर बाहर रहने वाले लोग भी अपने घर पहुंचते है. वैसे मिथिला के प्रत्येक घरों में दुर्गापूजा के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवती दुर्गा का अराधना यहां पूरे वर्ष होती है. क्योंकि यह शिव शक्ति का साधना क्षेत्र माना गया है. भारत का उत्तरी पूर्वी इलाका और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल शाम्भव साधको के लिए प्रिय रहा है. दरभंगा राज के श्मशान परिसर, माधवेश्वर प्रांगण, महान साधक और महाराजा रमेश्वर सिंह की चिता पर श्रीरमेश्वरी श्यामा के प्रांगण में श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा रही है.

