Home मुख्य बाबा नागार्जुन के ग्राम तरौनी से गुजरात के कच्छ तक मनायी गयी पुण्यतिथि। Voice of Darbhanga
मुख्य - November 5, 2016

बाबा नागार्जुन के ग्राम तरौनी से गुजरात के कच्छ तक मनायी गयी पुण्यतिथि। Voice of Darbhanga

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दरभंगा: मैथिली एवं हिंदी के महान कवि बाबा नागार्जुन की 18वीं पुण्यतिथि उनके गृह ग्राम बेनीपुर प्रखंड के तरौनी में प्रखंड निर्माण सेना के अध्यक्ष सुनील झा उर्फ़ मोतीबाबू की अध्यक्षता में मनायी गयी और पुस्तकालय स्थित उनके प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया गया। कार्यक्रम में सुमिति झा एवं रॉबिन खान आदि की प्रमुख रूप से सक्रियता रही।
वहीँ बाबा नागार्जुन ग्राम सेवा समिति सह तरौनी प्रखंड निर्माण सेना के संयोजक एवं श्री कच्छ जनरल मजदूर संघ के अध्यक्ष संतोष मिश्र ने गुजरात के कच्छ में आयोजित पुण्यतिथि कार्यक्रम पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उपस्थित सदस्यों को बाबा का परिचय देते हुए कहा कि नागार्जुन हिन्दीऔर मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही “यात्री” हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के “संयुक्त निकाय” का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के भिक्षुओं को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली। इस अवसर पर सह संयोजक वंदना मिश्रा ने भी बाबा के सपनो को पूरा करने का संकल्प दुहराया।कार्यक्रम में श्री कच्छ जनरल मजदूर संघ के प्रदीप श्रीवास्तव शेखर पाल अनिता मिश्रा आदि भी उपस्थित थे।

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एक अन्य कार्यक्रम में दरभंगा शहर में (माले) के जिला कार्यालय में रेणु-नागार्जुन सभागार में माले नेता आर के सहनी की अध्यक्षता में बाबा नागार्जुन की पूणतिथि के मौके पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। स्मृति सभा को संबोधित करते हुये माले जिला सचिव बैद्यनाथ यादव ने कहाकि बाबा नागार्जुन अपने पूरा जीवन में सामाजिक- आर्थिक उत्पीड़न व कुरीतियों के खिलाफ उत्पीड़ित की आवाज थे और आज भी उनकी रचनाएँ उत्पीड़न व बदलाव के तमाम संघर्षों में रोशनी दे रही हैं।

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