
घाटे का सौदा साबित हो रहा है धान की खेती, खरीदार नहीं मिलने से किसान परेशान। Voice of Darbhanga

दरभंगा : एक तरफ वैज्ञानिक ढंग से कृषि कार्य करने में यह व्यवसाई फायदे का सौदा साबित हो रहा है. लेकिन गांव में रहने वाले आम किसान कृषि कार्य को घाटे का सौदा बता रहे है, चूंकि उनके समक्ष परंपरागत खेती करने के शिवाय को रास्ता नहीं है. राज्य सरकार पिछले एक दशक से कृषि रोड मैप बना रही है. पर अब तक यह कागज पर हीं लग रहा है. ऐसी बात नहीं है कि राज्य सरकारे कृषि मद में कम राशि व्यय करती है. बल्कि पहले के तुलना में काफि अधिक रकम राज्य सरकार कि ओर से व्यय किया जा रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश हो या फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों नेता जब कभी मिथिला आए और सार्वजनिक संबोधन किया कि मिथिला के विकास के बिना बिहार का विकास और बिहार के विकास के बिना देश का विकास नहीं होगा. यह तथ्य तब सरजर्मी पर अमलीजामा पहनेगी जब कि मिथिला के किसानों का विकास होगा चूंकि यहां के 90 फीसद आबादी किसान और मजदूरों कि है. वैसे तो कृषि प्रशिक्षण तो सरकार कि ओर से अधिकरी करते रहते हैं पर इस देखने के लिए अब तक कोई नीति नहीं बनी कि किसानों का इसमें क्या भला हुआ. वैसे तो मिथिला हमेशा से बाढ़ और सुखार कि त्रासदी झेलता रहा है. वर्तमान में किसानो के समक्ष धान की कटाई और रब्बी की बुआई बड़ी चुनौती है. रब्बी कि बुआई के लिए समय समाप्त हो रहा है और किसानों के खेत में धान कि फसल अभी तक लगा हुआ है. कई जगह तो आलम यह है कि धान कटाई के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं तो कई किसानों के खेतो में धान का बोझा पड़ा हुआ है. सरकारी स्तर पर धान की खरीद शुरू नहीं हुई है. लोग यह मान के चल रहे हैं कि किसानो से धान की खरीद भी कहीं हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख की तरह जुमला ही रह जाए. वैसे जरूरतमंद किसान औने-पौने किमत पर भी धान की फसल बेचने को तैयार है पर खरीदार नहीं है. खरीदार अगर संयोग से मिल भी जाते हैं तो नगद भुगतान के लिए खरीदार तैयार नहीं है. एक किसान ने बताया सरकारी खरीद दर से आधी कीमत पर खरीदार तो मिला लेकिन नगद देने के लिए वह तैयार नहीं हुआ. उसका कहना था कि धान लेकर मिलर जब उन्हें चेक देगा तब आपको भी मैं चेक से भुगतान करूंगा. ऐसे में औने-पौने दर पर बेचने से क्या फायदा किसानों को तो अपने रोज मररे की खर्चा और रब्बी खेती के लिए नगद राशि कि आश्वकता है. उक्त किसान ने बताया कि हमलोंगो के बच्चे रोजी-रोटी के तलाश में महानगर गए हुए है और नोटबंदी के कारण उनकी स्थिति भी वहां ठीक नहीं है. ऐसे में महानगर जा कर भी कोई फायदा नहीं है. यही कारण है कि हमलोग यहां घाटे का सौदा रहने के बावजूद अपने भोजन के लिए कृषि कार्य कर रहे है. ये तो रही धान की बात रब्बी कि बात करें तो उसके लिए सिचाई सबसे बड़ी समस्या है. जहां तक राजकिय नलकु और लिफ्टऐरिगेशन की बात है तो जिला में 95 प्रतिशत राजकिय नलकु से सिचाई नहीं होती. लिफ्टऐरिगेशन तो पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है. कांग्रेस शासन के अंतीम दिनों में हीं यहां राजकिय नलकु ठप हो गए थे. लालू-राबड़ी शासनकाल में पूरी तरह ठप रहा. नीतीश-मोदी शासनकाल में एक दशक पहले इस चालू करने कि जारेशोर से प्रयास किया गया और अब पुन: नीतीश-लालू और कांगे्रस का शासन बिहार में है. फिर भी किसानों के खेत में सिचाई व्यवस्था नहीं है. एक तरफ किसानों तो वैज्ञानिक तरिके से खेती करना चाहते हैं ताकि उनकी माली हालत भी सुधरे लेकिन सबसे बड़ी बाधा कृषि उत्पाद का बाजार नहीं है और न ही किसानों को तकनिक की जानकारी है. बहरहाल अगर किसानों को तकनिक और बाजार उपलब्ध करा दिया जाय तो निश्चत रूप से मिथिला कि धरती सोना उगलेगी. इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

