Home Featured संस्कृत का विकास नहीं होगा तो हमारी अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी: कुलपति
2 weeks ago

संस्कृत का विकास नहीं होगा तो हमारी अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी: कुलपति

दरभंगा: प्रकृति द्वारा प्रदत समय हमारे लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।इसका सम्मान तथा बेहतर उपयोग हमारे लिए लाभदायक है।संस्कृत के विकास के प्रति हमारी संकल्पना मात्र औपचारिक ही नहीं, बल्कि अन्तःमन से होनी चाहिए।इस दृष्टि से यह 10 दिवसीय संभाषण शिविर संस्कृत के विकास में मील का पत्थर सिद्ध होगा।यदि संस्कृत का विकास नहीं होगा तो हमारी अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी।उक्त बातें मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार सिंह ने विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग तथा लोक भाषा प्रचार समिति,बिहार शाखा के संयुक्त तत्त्वावधान में स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग के सभागार में चल रहे दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर के समापन समारोह का दीप प्रज्वलित कर उद्घाटन करते हुए कहा। उन्होंने शिविर को सफल बताते हुए इसके लिए संस्कृत के शिक्षकों तथा प्रतिदिन शिविर की खबरों को प्रमुखता देने के लिए पत्रकारों को धन्यवाद दिया। कुलपति ने कहा कि प्रशिक्षणार्थी को स्वमूल्यांकन करना चाहिए कि वे 10 दिनों में अपने उद्देश्यों में कितना सफल रहे? साथ ही आयोजकों को भी शिविर के प्रारंभ में तथा अंत में जांच परीक्षा लेकर उनके ज्ञान की वृद्धि को अवश्य जानना चाहिए।

मुख्य अतिथि के रूप में जगन्नाथपुरी से आए लोक भाषा प्रचार समिति के संस्थापक डॉ सदानंद दीक्षित ने कहा कि वैदिक काल से ही मिथिला ज्ञान-विज्ञान की भूमि रही है।यह भूमि अपनी विद्वत-परंपरा के लिए गौरवान्वित होता रहा है। संस्कृत विश्व की सर्वश्रेष्ठ तथा सुरक्षित भाषा है।इसमें मौलिक ज्ञान विज्ञान विद्यमान है, जिसपर अनवरत शोध की जरुरत है,ताकि संस्कृत का संरक्षण व संवर्धन होता रहे।उन्होंने कहा कि हमारे देश में सब कुछ उपलब्ध है।सिर्फ सब लोगों में स्वाभिमान जगाने की आवश्यकता है,ताकि हमारे राष्ट्र की सुरक्षा एवं उन्नति हो सके।यदि हममें स्वाभिमान पूरी तरह जाग जाए तो हमारा देश सबसे आगे होगा। उन्होंने छात्रों का आह्वान किया कि वे संस्कृत के प्रचार प्रसार के द्वारा इसे मातृभाषा बनाएं।
इस अवसर पर लोक भाषा प्रचार समिति, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित संस्कृत प्रशिक्षणम् पुस्तक का प्रदर्शन किया गया। समारोह में डॉ कृष्णचंद्र सिंह,डॉ कमलनाथ झा,डॉ आर एन चौरसिया, डॉ विनोदानंद झा,प्रोफेसर हिमांशु शेखर,प्रो अरुणिमा सिन्हा,डॉ दयानंद मिश्र, डॉ अनुरंजन,डॉ गौरव सिक्का, डॉ मंजू कुमारी,डॉ चौधरी हेमचंद्र राय,डॉ संजीव राय, उदय शंकर मिश्र,तरुण मिश्र, डॉ मुकेश प्रसाद निराला, प्रोफेसर मनोज कुमार झा, डॉ शंभू झा,जय प्रकाश पाठक,शशिकांत झा,प्रो बोआ नंद झा,डॉ विनय कुमार मिश्र आदि उपस्थित थे।प्रतिभागियों की ओर से आदित्य तथा प्रकाश झा ने अपने शिविर के अनुभवों को व्यक्त किया। छात्र प्रतिभागियों के रूप में राहुल रेणु ,प्रशांत कुमार,अजय कुमार,चंदन कुमार ठाकुर, पंकज आदि सक्रिय रहे।
वेद ध्वनि गजेंद्र तथा राजेश्वर झा ने प्रस्तुत किया।गीतगोविंदम के पंक्तियों का गायन तथा श्रावण गीत पारस पंकज ने प्रस्तुत किया।आगत अतिथियों का स्वागत प्रोफेसर रामनाथ सिंह ने किया,जबकि संचालन डॉ जयशंकर झा ने किया।

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