Home Featured दिव्यांगजनों के लिए नैदानिक चिकित्सा अति महत्वपूर्ण : कुलपति।
3 weeks ago

दिव्यांगजनों के लिए नैदानिक चिकित्सा अति महत्वपूर्ण : कुलपति।

दरभंगा। पहले दिव्यांगों का सही मूल्यांकन हो,तभी उनके लिए उचित ढंग से उपचार संभव होगा।इसके लिए नैदानिक चिकित्सा की महत्वपूर्ण भूमिका है।शारीरिक व मानसिक दिव्यांगता में मानसिक दिव्यांग का अधिक कष्ट कर है,जिसका निदान मनोचिकित्सकों द्वारा ही संभव है।उक्त बातें विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र कुमार सिंह ने सीएम कॉलेज,दरभंगा के मनोविज्ञान विभाग तथा भारतीय स्वास्थ्य,शोध एवं कल्याण संघ,हिसार, हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में दिव्यांगजनों के मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का मूल्यांकन तथा हस्तक्षेप विषयक तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का दीप प्रज्वलित कर मुख्य अतिथि के रूप में उद्घाटन करते हुए कहा। उन्होंने निर्देशित किया कि कॉलेज शीघ्र दिव्यांगों से संबंधित नैदानिक मनोविज्ञान में सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स शुरू करें। विश्वविद्यालय उन्हें पूरी सहायता प्रदान करेगा। कुलपति ने लगातार शैक्षणिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजन हेतु प्रधानाचार्य को बधाई देते हुए महाविद्यालय प्रशासन की प्रशंसा की।उन्होंने इस कार्यशाला को कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण बताते हुए विषय को समाजोपयोगी एवं प्रासंगिक माना।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रधानाचार्य डॉ मुश्ताक अहमद ने कहा कि ऐसी कार्यशाला विश्वविद्यालय तथा उत्तर बिहार में पहली बार आयोजित हो रही है।यह विषय ज्वलंत एवं सामाजिक सरोकार से संबंध है।उन्होंने कुलपति को आश्वस्त किया कि महाविद्यालय कुलपति की सभी इच्छाओं की पूर्ति करेगा तथा दिव्यांगों से संबंधत कोर्स हेतु शीघ्र ही प्रस्ताव भेजेगा।प्रधानाचार्य ने कहा कि आज वर्तमान कुलपति के कारण ही राज्य एवं देश की सकारात्मक निगाहें मिथिला विश्वविद्यालय पर लगी हैं।
पारस हॉस्पिटल,पटना के मनोचिकित्सक डॉक्टर नीरज कुमार वेदपुरिया ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि दिव्यांगों के संबंध में आज समाज में जानकारी तथा जागरूकता का काफी अभाव है। दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में लाने हेतु कई सरकारी प्रयास किए जा रहे हैं।विषय की जानकारी देते हुए महाविद्यालय आइक्यूएसी के कोऑर्डिनेटर डॉ जिया हैदर ने कहा कि जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ व्यक्ति दिव्यांग हैं,जो कुल जनसंख्या का 2.21%है। इसमें 7.9 प्रतिशत बहुदिव्यांग हैं। कुल दिव्यांगों में से करीब 75% व्यक्ति गांव में रहते हैं, जिनकी पूर्ण जानकारी, मूल्यांकन तथा चिकित्सा व्यवस्था काफी कठिन है। कार्यशाला में डॉ सुनील सैनी, प्रो मंजू राय,डॉ अवनि रंजन सिंह,प्रो गिरीश कुमार, डॉ अमरेंद्र शर्मा, प्रो चंद्रशेखर मिश्र,डॉ आर एन चौरसिया, डॉ वासुदेव साहू,डॉ प्रीति त्रिपाठी,डॉ पुनीता कुमारी, प्रो रीता दुबे,डॉ प्रीति कनोडिया, डॉ अभिलाषा कुमारी, प्रो रागनी रंजन,डा रीना कुमारी, प्रो अमृत कुमार झा,प्रो विकास कुमार,डॉ शशांक शुक्ला,डॉ यादवेंद्र सिंह, डॉ अनुपम कुमार सिंह, प्रोफेसर राजानंद झा,डा मयंक श्रीवास्तव,डॉ विमल कुमार चौधरी,डॉ विष्णु कांत चौधरी, इंजीनियर प्रेरणा कुमारी,रवि कुमार सहित एक सौ से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे।
उद्घाटन सत्र के उपरांत कई तकनीकी सत्र संपन्न हुए, जिनमें प्रतिभागियों ने विषय से संबद्ध अनेक शोध पत्र प्रस्तुत किए।रिपोर्टीयर का कार्य प्रोफेसर अमृत कुमार झा ने किया।
आगत अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ तथा मोमेंटो देकर किया गया।डॉ एकता श्रीवास्तव के संचालन में आयोजित उद्घाटन सत्र में अतिथियों का स्वागत मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो नथनी यादव ने किया,जबकि धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डॉ विजयसेन पांडे ने किया।

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