Home Featured क्या बोर्ड लगाने से खत्म हो गई जिम्मेदारी, या बड़ी घटना के बाद जागेगा विभाग ?

क्या बोर्ड लगाने से खत्म हो गई जिम्मेदारी, या बड़ी घटना के बाद जागेगा विभाग ?

दरभंगा: जिले के कई इलाकों में जर्जर और क्षतिग्रस्त पुलों पर चेतावनी बोर्ड लगाकर लोगों को खतरे से आगाह किया जा रहा है। कहीं भारी वाहनों के परिचालन पर रोक है तो कहीं लोहे की बैरिकेडिंग कर रास्ता सीमित किया गया है। लेकिन सवाल अब चेतावनी बोर्ड से आगे का है। क्या सिर्फ बोर्ड लगा देने से संबंधित विभाग की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? या फिर किसी बड़ी घटना के बाद ही विभाग की नींद खुलेगी?

बेनीपुर क्षेत्र में कमला नदी पर फटकी घाट पुल इसका उदाहरण है। तुलापट्टी-नावानगर क्षेत्र को जोड़ने वाले इस पुल की स्थिति को देखते हुए वाहन परिचालन को लेकर चेतावनी दी गई है। भारी वाहनों को रोकने के लिए अवरोधक भी लगाए गए हैं। लेकिन पुल की स्थायी मरम्मत या पुनर्निर्माण कब होगा, इसकी स्पष्ट समय-सीमा सामने नहीं है।

बहादुरपुर प्रखंड के कुशोथर गांव में उच्च विद्यालय के समीप फैकला-चिकनी सड़क पर कमला नदी के पुराने पुल पर लोहे की बैरिकेडिंग की गई है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से कुशोथर गांव का यह पुल अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि दोनार में भीषण जाम और शहर में चल रहे निर्माण कार्य को लेकर कुशेश्वर से आने वाले सरकारी अधिकारियों के वाहन, एम्बुलेंस आदि अब चिकनी से इसी रास्ते का इस्तेमाल करके जिला मुख्यालय पहुंचते हैं।

वहीं डाइंग गांव में कमला नदी पर बने स्क्रू-पाइल पुल पर भी बैरिकेड और चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं। सुरक्षा के लिहाज से ये कदम जरूरी हैं, लेकिन इनके बाद अगला कदम क्या है, यह सवाल बना हुआ है।

तारडीह प्रखंड मुख्यालय के समीप वर्ष 1994 में करीब 10 लाख रुपये की लागत से बना स्क्रू-पाइल पुल भी जर्जर हो चुका है। करीब 32 साल पुराने इस पुल की लोहे की संरचना में जंग और दरारें हैं। भारी वाहनों को रोकने के लिए दोनों ओर लोहे के एंगल लगाए गए हैं। चार पंचायतों के आवागमन की महत्वपूर्ण कड़ी होने के कारण इस पुल की स्थिति स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय है।

वहीं बथई में वर्ष 2007 में बने स्क्रू-पाइल पुल को नए पुल के निर्माण के लिए तोड़ दिया गया, लेकिन करीब 4.90 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित आरसीसी पुल का निर्माण निर्धारित समय-सीमा 28 फरवरी 2025 बीतने के बाद भी शुरू नहीं हो सका। परिणामस्वरूप ग्रामीणों को 12 से 15 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। वहीं कीरतपुर प्रखंड एक रसियारी – कीरतपुर सड़क विगत दो साल पूर्व बने पुल पर भी भारी वाहन के आवागमन को लेकर चेतावनी बोर्ड लगा दिया गया है ।

खतरे का बोर्ड लगा, लेकिन आगे की कार्रवाई कब?

जिले के अलग-अलग हिस्सों में सामने आए इन मामलों में एक बात समान है। खतरे की सूचना मौजूद है, लेकिन स्थायी समाधान की तारीख गायब है।

क्षतिग्रस्त पुल पर चेतावनी बोर्ड लगाना जरूरी है, लेकिन यह व्यवस्था तभी पर्याप्त मानी जा सकती है जब उसके साथ पुल की नियमित निगरानी, तकनीकी जांच, आवश्यक बैरिकेडिंग, वैकल्पिक मार्ग और समयबद्ध मरम्मत अथवा पुनर्निर्माण की कार्रवाई भी हो। क्योंकि सवाल सिर्फ पुल का नहीं, उस पुल से रोज गुजरने वाले लोगों की सुरक्षा का है।

रसियारी – कीरतपुर पुल पर लगे बोर्ड

घटना से पहले कार्रवाई होगी या घटना के बाद?

प्रशासन और संबंधित विभाग के सामने अब कई सवाल हैं-जिले में कितने पुल क्षतिग्रस्त घोषित हैं? कितने पुलों पर चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं? कितनों का तकनीकी निरीक्षण हुआ? कितने पुलों की मरम्मत या पुनर्निर्माण के लिए प्राक्कलन और राशि स्वीकृत है? और सबसे महत्वपूर्ण-इन पुलों को सुरक्षित बनाने की समय-सीमा क्या है?

बोर्ड लोगों को खतरे की सूचना दे सकता है, लेकिन खतरे को खत्म नहीं कर सकता।

ऐसे में सवाल यही है-क्या बोर्ड लगाने से विभाग की जिम्मेदारी खत्म हो गई, या किसी बड़ी घटना के बाद ही प्रशासन और संबंधित विभाग जागेगा?

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