Home Featured आंध्र प्रदेश की तेलुगु बेटी ने मिथिला में मनाई मधुश्रावणी, साझा किया अनोखा अनुभव।
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आंध्र प्रदेश की तेलुगु बेटी ने मिथिला में मनाई मधुश्रावणी, साझा किया अनोखा अनुभव।

दरभंगा: मिथिला की समृद्ध संस्कृति और परंपराएं देश-दुनिया के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं। इसी सांस्कृतिक आकर्षण का एक खूबसूरत उदाहरण देखने को मिला, जब आंध्र प्रदेश के विजयनगरम की रहने वाली और हैदराबाद में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत साईं रम्या झा ने मिथिला की प्रसिद्ध परंपरा मधुश्रावणी में हिस्सा लिया।

मिथिला के युवक से विवाह के बाद रम्या ने पहली बार मधुश्रावणी पर्व की परंपराओं को करीब से जाना और निभाया। डिजिटल प्लेटफॉर्म को दिए विशेष साक्षात्कार में उन्होंने इस पूरे अनुभव को साझा करते हुए बताया कि शुरुआत में उन्हें कई रस्मों और नियमों को लेकर थोड़ी झिझक और उत्सुकता दोनों थी, लेकिन ससुराल वालों के सहयोग ने इस अनुभव को बेहद सुखद और यादगार बना दिया।

12-15 दिनों की छुट्टी और कठिन नियमों को लेकर थी झिझक

हैदराबाद में आईटी सेक्टर में काम करने वाली रम्या के लिए मधुश्रावणी की लंबी अवधि और इससे जुड़े नियम बिल्कुल नए थे। उन्होंने बताया कि 12 से 15 दिनों की छुट्टी लेने, सुबह जल्दी उठने, बिना नमक का भोजन करने और व्रत जैसी परंपराओं को लेकर शुरुआत में उनके मन में थोड़ा डर था।

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हालांकि, परिवार के सहयोग और अपनापन मिलने के बाद धीरे-धीरे वह इन परंपराओं का हिस्सा बनती चली गईं। रम्या के मुताबिक, जो चीज शुरुआत में चुनौती लग रही थी, वही बाद में उनके लिए आनंद और सीख का अनुभव बन गई।

ननद ने भाषा की दूरी को बनाया आसान

मैथिली भाषा रम्या के लिए नई होने के बावजूद उनके परिवार ने भाषा की दूरी को आड़े नहीं आने दिया। उनकी ननद पहले कथा सुनती हैं और उसके बाद उसका अर्थ और पूरी कहानी उन्हें हिंदी और अंग्रेजी में समझाती हैं।

रम्या ने बताया कि पूजा की तैयारियों में फूल सजाना और टोकरी तैयार करना उन्हें विशेष रूप से पसंद आ रहा है। इन छोटी-छोटी गतिविधियों के जरिए वह मिथिला की संस्कृति को सिर्फ देख नहीं रहीं, बल्कि उसे महसूस भी कर रही हैं।

दक्षिण भारत और मिथिला की परंपराओं में महसूस किया अंतर

रम्या ने दक्षिण भारत और मिथिला की संस्कृति के बीच कई अंतर भी महसूस किए। उन्होंने बताया कि यहां समय, दिशाओं और पूजा-पद्धति से जुड़े रीति-रिवाज दक्षिण भारत से काफी अलग हैं।

मधुश्रावणी के दौरान खान-पान को लेकर भी उनके कुछ मजेदार अनुभव रहे। व्रत और बिना नमक के भोजन के बीच उन्हें दक्षिण भारतीय व्यंजनों, खासकर सांभर और खट्टे स्वाद की क्रेविंग होने लगी। उन्होंने इसे मुस्कुराते हुए अपने अनुभव का एक मजेदार हिस्सा बताया।

मिथिला के अपनापन ने जीता दिल

रम्या ने मिथिला के लोगों की गर्मजोशी और आतिथ्य भावना की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि यहां लोगों के स्वागत करने का तरीका और बड़ों का आशीर्वाद देने की परंपरा उन्हें बेहद अच्छी लगी।

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दरभंगा के मंदिरों में पूजा के लिए फूल सजाने से लेकर भ्रमण तक के दौरान उन्होंने मिथिला की संस्कृति को करीब से महसूस किया। उनके लिए यह सिर्फ एक धार्मिक पर्व में शामिल होना नहीं, बल्कि दो अलग-अलग संस्कृतियों के बीच रिश्ते और अपनापन महसूस करने का अवसर भी रहा।

साईं रम्या झा का यह अनुभव इस बात का खूबसूरत उदाहरण है कि विवाह के रिश्ते के साथ जब दो संस्कृतियां जुड़ती हैं, तो परंपराओं का आदान-प्रदान रिश्तों को और भी मजबूत बना सकता है। आंध्र प्रदेश की बेटी का मिथिला की बहू बनकर मधुश्रावणी मनाना इसी सांस्कृतिक संगम की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करता है।

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