
हर बाढ़ में बह जाता है 250 मीटर का चचरी पुल, फिर चंदे से बनती है 12 गांवों की लाइफलाइन।
दरभंगा: दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड का रहिपुरा गांव आज भी विकास की उस तस्वीर को सामने रखता है, जहां सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाएं ग्रामीणों के लिए सपना बनी हुई हैं। करीब 250 मीटर लंबा बांस का चचरी पुल यहां लगभग 12 गांवों के लोगों की लाइफलाइन बना हुआ है।

बाढ़ का पानी बढ़ते ही यह चचरी पुल अक्सर बह जाता है। इसके बाद ग्रामीण सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय खुद चंदा जुटाकर पुल का निर्माण करते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, हर बार करीब एक लाख रुपये तक चंदा जुटाकर किसी तरह आवागमन का रास्ता तैयार किया जाता है।
मरीजों और गर्भवती महिलाओं की सबसे बड़ी परेशानी
इस अस्थायी पुल से होकर रोजाना बड़ी संख्या में लोग आवागमन करते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को होती है। आपात स्थिति में उन्हें इसी संकरे और अस्थिर पुल से होकर गुजरना पड़ता है।
स्कूली बच्चों की मजबूरी भी कम नहीं है। रोजाना बच्चे जान जोखिम में डालकर चचरी पुल पार कर स्कूल पहुंचते हैं। बाढ़ के दौरान पुल पर फिसलन और तेज पानी का बहाव खतरे को और बढ़ा देता है।
हर चुनाव में मिलता है पक्के पुल का भरोसा
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधियों की ओर से यहां पक्के पुल का निर्माण कराने के वादे किए जाते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद वही वादे फाइलों और आश्वासनों तक सीमित रह जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे इसी तरह बांस के पुल के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं। हर साल बाढ़ आती है, पुल बह जाता है और फिर ग्रामीण अपने स्तर से चंदा जुटाकर इसे तैयार करते हैं। उनका सवाल है कि जब ग्रामीण हर साल पुल बनाने के लिए पैसा और श्रम लगा सकते हैं, तो सरकार स्थायी पुल का निर्माण क्यों नहीं करा सकती?
सवाल सिर्फ पुल का नहीं, 12 गांवों के भविष्य का है
रहिपुरा का यह चचरी पुल महज आवागमन का साधन नहीं, बल्कि करीब 12 गांवों के लोगों की रोजमर्रा की जरूरत है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बाजार तक पहुंच-इन सभी के लिए ग्रामीणों को इसी रास्ते पर निर्भर रहना पड़ता है।

ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए स्थल का स्थायी समाधान करे और यहां जल्द से जल्द पक्के पुल का निर्माण कराया जाए, ताकि हर साल बाढ़ के साथ उनकी परेशानी और चंदा जुटाकर पुल बनाने की मजबूरी खत्म हो सके। ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, जमीन पर पक्का पुल चाहिए।

