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November 24, 2019

जमीन जनता की, पैसा केंद्र सरकार का, पढ़ेंगे गरीब के बच्चे और विरोध कर रही है राज्य सरकार: बीके सिंह।

दरभंगा: राज्य के गरीब एवं साधारण परिवार से आने वाले बच्चों के लिए खोले जाने वाले केंद्रीय विद्यालय का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा किए जा रहे विरोध के खिलाफ राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा आगामी 26 नवंबर से आमरण अनशन करेंगे।
उक्त बातें राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के बिहार प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष बीके सिंह रविवार को दरभंगा परिसदन में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहीं। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए श्री सिंह ने बताया कि रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भारत सरकार के पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने अपने मंत्रित्व काल में बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की स्थापना हेतु अनेक प्रयास किए थे। उन्होंने मंत्री बनते ही घोषणा की थी कि राज्य सरकार जितनी जगह पर केंद्रीय विद्यालय खोलने का प्रस्ताव हमें देगी, उन सभी जगहों पर विद्यालय खुलेंगे। मगर बार-बार आग्रह के बावजूद प्रस्ताव नहीं भेजे गए। श्री कुशवाहा ने अथक प्रयास कर किसी तरह दो प्रस्ताव भिजवाए, एक नवादा जिला में नवादा और दूसरा औरंगाबाद जिला के देवकुंड केलिए। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा उक्त दोनों प्रस्तावों के आलोक में पिछले वर्ष अर्थात 2018 के अगस्त महीने में ही नवादा और देवकुंड में विद्यालय खोलने की स्वीकृति दे दी गई। उस वक्त इन विद्यालयों के साथ देशभर में 11 और विद्यालयों अर्थात कुल 13 विद्यालयों की स्वीकृति हुई थी। बिहार से बाहर के लिए अधिकांश विद्यालय पिछले साल ही खुल गए और पिछले सत्र से पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है। बिहार सरकार ने खुद ही विद्यालय खोलने के प्रस्ताव के साथ इनके निर्माण हेतु जमीन देने का लिखित वादा किया था, जबकि अब उक्त जमीन को देने से मना कर रही है।
श्री सिंह ने कहा कि राज्यवासियों को यह जानकर अत्यंत दुख होगा कि औरंगाबाद के देवकुंड में प्रस्तावित विद्यालय के लिए तो वहां के एक सज्जन ने अपनी निजी जमीन दान स्वरूप दे दी। स्पष्ट है कि इस विद्यालय की स्थापना मे सरकार को न तो एक इंच अपनी जमीन देनी है और एक पैसा अपने कोष से खर्च करना है। जमीन जनता की, पैसा भारत सरकार का, पढेंगे गरीब घर के बच्चे और विरोध कर रही है राज्य सरकार।
राज्य सरकार के इस रवैया में परिवर्तन के लिए पार्टी की ओर से आंदोलन भी किए गए। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मंत्री रहते हुए मुख्यमंत्री से मिलकर आग्रह किया, शिक्षा मंत्री से मिलकर गुहार लगाई, अधिकारियों से दर्जनों बार बात की। मगर राज्य सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगा। अंत में मजबूर होकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने आगामी 26 नवंबर 2019 से पटना में आमरण अनशन करने का निर्णय लिया है।
कार्यकारी अध्यक्ष बीके सिंह ने बताया कि श्री कुशवाहा ने भारत सरकार में मंत्री रहते हुए बिहार में कैमूर, शेखपुरा, मधुबनी, मधेपुरा, सुपौल, अरवल आदि जिलों जहां एक भी केंद्रीय विद्यालय नहीं है, में भी विद्यालय के स्थापना के प्रस्ताव को मंत्रालय की योजना में शामिल करवाया। भारत सरकार की ओर से उक्त जिलों के लिए प्रदेश की सरकार से प्रस्ताव की मांग की गई। मगर तीन वर्षों में बिहार सरकार प्रस्ताव भेजने में भी फिसड्डी साबित हुई। श्री कुशवाहा की घोषणा और मंत्रालय के निर्णय के अनुसार यदि प्रस्ताव भेज दिया गया होता तो वहां भी स्कूल खुल जाता।
बिहार में पूर्व से संचालित लगभग डेढ़ दर्जन केंद्रीय विद्यालय जमीन के अभाव में 30-30 वर्षों से छोटे से अस्थाई भवन में चलाए जा रहे हैं। नतीजा है कि जगह के अभाव में कई विद्यालय बंद होने के कगार पर है। श्री कुशवाहा ने मंत्री रहते राज्य सरकार से जमीन देने के लिए एड़ी चोटी एक कर दिया, परंतु राज सरकार इस मामले में भी सोई रही।
श्री सिंह ने बताया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में स्थायी भवन में संचालित विद्यालयों में औसतन लगभग 1500 बच्चे प्रतिवर्ष विद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं जबकि अस्थाई भवन में चलने वाले विद्यालय में मात्र लगभग 450 बच्चों का ही नामांकन हो पाता है। जाहिर है कि अगर और स्थाई भवन के लिए राज्य की सरकार जमीन उपलब्ध करा देती तो अभी जितने बच्चे वहां पढ़ रहे हैं उस से तीन गुना अधिक बच्चों को पढ़ने की सुविधा मिल जाती।
श्री सिंह ने कहा कि केंद्रीय विद्यालयों के संचालन हेतु 100% राशि भारत सरकार द्वारा खर्च किया जाता है। जमीन राज्य की सरकार द्वारा उपलब्ध करायी जाती है। देश के सभी राज्यों के लिए ऐसा ही नियम है। ऐसे में बिहार सरकार जमीन देने से सीधे तौर पर मना नहीं कर सकती है। यही कारण है कि जमीन देने के लिए अजीबोगरीब शर्त का सहारा ले रही है। वर्ष 2017 में ही बिहार सरकार ने भारत सरकार के शिक्षा विभाग को एक पत्र लिखकर कहा है कि केंद्रीय विद्यालय के लिए भारत सरकार को जमीन तभी उपलब्ध करायी जाएगी, जब इस बात का अंडर टेकिंग केंद्र सरकार दे कि खुलने वाले विद्यालय में कम से कम 50% बिहार के बच्चे के नामांकन की व्यवस्था सुनिश्चित हो। बिहार सरकार की इस अड़ंगेबाजी का सच और हकीकत जानने के लिए केंद्रीय विद्यालय संगठन ने एक सर्वे करवाया जिसके अनुसार प्रदेश भर में संचालित विद्यालयों में 95 से 99 और 100 प्रतिशत बच्चे बिहार के हैं। अब यह बात समझ से परे है कि आखिर जब 90 से 99 और 100 प्रतिशत तक बच्चे बिहार के हैं तो 50% की शर्त रखने का आखिर क्या अर्थ है! इससे स्पष्ट है कि ऐसी शर्त स्कूल नहीं खोलने देने के लिए बहानेबाजी के सिवा और कुछ नहीं है।
बिहार में राज्य सरकार के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के स्थापना पर चर्चा करते हुए श्री सिंह ने बताया यहां भी अनेक तरह के सुधारों की जरूरत है। ऐसे ही सुधारों की अपेक्षा से अपनी 25 सूत्री मांगों के साथ वर्ष 2016 से ही हमारी पार्टी की ओर से निरंतर शिक्षा सुधार-पुस्तक उपहार, शिक्षा सुधार-शिक्षक सत्कार एवं शिक्षा सुधार-मानव कतार आदि कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान अनशन के कार्यक्रम को नाम दिया गया है शिक्षा सुधार वरना जीना बेकार।

प्रेस वार्ता के दौरान अंत में समाज के सभी सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं बुद्धिजीवियों गुरुजनों पत्रकारों चिकित्सकों अधिवक्ताओं एवं आमजनों से अपील करते हुए कार्यकारी अध्यक्ष श्री बीके सिंह ने अपील किया कि इस अभियान में सभी हमारा सहयोग करें ताकि हम शिक्षा में सुधार करके ही रहेंगे के अपने संकल्प को पूरा करने में कामयाब हो सकें।

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