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June 28, 2022

पर्यावरण संरक्षण में पौधशालाओं की भूमिका विषय पर संगोष्ठी का आयोजन।

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दरभंगा: शहर के नागेंद्र झा महिला महाविद्यालय के सभागार में डॉ प्रभात दास फाउण्डेशन का सत्रहवां स्थापना दिवस कार्यक्रम मनाया गया। स्थापना दिवस पर पर्यावरण संरक्षण में पौधशालाओं की भूमिका विषयक संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। इस कार्यक्रम में समस्तीपुर, दरभंगा और सीतामढ़ी जिले के कुल 30 नर्सरी संचालकों और दस फाउण्डेशन कार्यकताओं को पर्यावरण रक्षक सम्मान से सम्मानित भी किया गया

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ विद्यानाथ झा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण में नर्सरी की अहम भूमिका है। नर्सरी का इतिहास चार-पाँच सौ सालों की है। माना जाता है कि मुगलकाल में नर्सरी की शुरुआत हुई थी। दरभंगा राज के द्वारा तो कलमी आम से देसी बीजू आम का वृक्ष बनाकर लगाए जाने का विवरण उपलब्ध है। कभी सिर्फ दरभंगा शहर में 1000 बगीचा हुआ करता था। पर आधुनिक मानवीय जरूरत उसे लील गई।

उन्होंने बताया कि बरगद, पीपल, नीम,तुलसी सरीखे वृक्षों को धर्मशास्त्र से इसलिए जोड़ा गया है ताकि इनका संरक्षण हो। पर्यावरण संरक्षण हर आदमी की जिम्मेवारी है। सब काम सरकार नहीं कर सकती हैं। पर्यावरण की रक्षा केलिए आमलोगों को आगे आना होगा।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूसा के कृषि वैज्ञानिक डॉ सुनील कुमार ने कहा कि भले ही नर्सरी व्यवसाय है पर यह सरोकार से जुड़ा हुआ है। आधुनिक दौर में नर्सरी की भूमिका बढ़ गई है। आमलोगों को पौधों के बारे ज्यादा जानकारी नहीं होती हैं, जबकि नर्सरी संचालक इन पौधों की देखभाल कर इन्हें वृक्ष बनने में मदद करते हैं।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि रसायनशास्त्री डॉ प्रेममोहन मिश्रा ने बताया कि नर्सरी शिशु मंदिर भी कहलाता है। जिस तरह माँ अपने बच्चे को पालती हैं उसी तरह की भूमिका नर्सरी की भी है। यहाँ पौधों को टेक्निक से पाला-पोसा जाता है। असल में पेड़-पौधे और मानव एक-दूसरे के पूरक है। हम मानव वृक्ष से ऑक्सीजन लेते हैं और ये हमारे द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं। हमारे जीवन के लिए जितना महत्वपूर्ण ऑक्सीजन है, पेड़ों के लिए उतना ही महत्व कार्बन डाइऑक्साइड रखता है। डॉ मिश्रा ने गहराई से व्याख्या कर बताया कि हमारे शास्त्रों में पर्यावरण रक्षा के तमाम उपाय किए गए थे। धनवान लोग पहले बगान लगाकर दान करते थे। लोग कब्रिस्तान और श्मशान में वृक्ष लगाते थे। अब यह सब समाप्त हो चुका है। पर अगर मानवों को धरती पर जीवन कायम रखना है तो उसे पर्यावरण की रक्षा करनी ही होगी। इसका दूसरा कोई विकल्प नहीं है। शहर में लोगों के पास जगह नहीं होता है। पर गमले में तो हर कोई पौधा लगा ही सकता है।

संगोष्ठी में बोलते हुए सीतामढ़ी के नागेन्द्र सिंह ने सबसे अधिक ऑक्सीजन छोड़ने, मच्छर भगाने और जहरीले जीव-जन्तु को भगाने वाले पेड़-पौधों के बारे बताया और कहा कि वृक्ष हर किसी के लिए उपयोगी है। जो लोग वृक्ष को नष्ट करते है,वृक्ष उसे भी जीवन देता है।

दरभंगा के नर्सरी संचालक मो.ईरशाद, मो.शमशाद अंसारी, मो नेमतुल्लाह अंसारी, शाहनवाज , मो.इम्तियाज इकबाल, जुल्फकार अनवर, मो.सर्राफफुल, मो मुमताज, मो.एकबाल आदि ने नर्सरी व्यवसाय में आनेवाली दुश्वारियों को बताया। साथ ही बताया कि 2004 की बाढ़ ने नर्सरी व्यवसाय की कमर तोड़ दी। इससे पहले दरभंगा जिले में 400 के करीब नर्सरी हुआ करता था। अब मुश्किल से 30 बचे हैं। सरकार के द्वारा नर्सरी संचालकों सब्सिडी नहीं मिलती हैं और ना ही मृत पौधों का मुआवजा। यह मिल जाए तो नर्सरी व्यवसाय और अधिक बढ़ेगा।

कार्यक्रम में फाउण्डेशन अतिथियों का स्वागत डॉ महादेव झा ने किया जबकि धन्यवाद समाजसेवी अजीत मिश्रा ने दिया। वहीं धन्यवाद ज्ञापन फाउण्डेशन सचिव मुकेश कुमार झा ने किया।

मौके पर फाउण्डेशन के राजू सिंह, नीरज चौधरी, अनील सिंह, मोहन साह, राकेश मिश्रा आदि मौजूद थे।

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